लंका काण्ड चौपाई (237-244)
लंका काण्ड चौपाई 237-244 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।।
जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही।।
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।।
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।।
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना।।
जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक।।
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा।।
सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।।
चौपाई (संदर्भ)
यह चौपाई अंगद द्वारा रावण को दी गई अंतिम और कठोर चेतावनी है। यहाँ अंगद नीति, धर्म और भविष्य—तीनों के आधार पर रावण को समझाते हैं।
1️⃣ भावार्थ :
अंगद कहते हैं—
“हे रावण! अपनी झूठी चतुराई छोड़ दे और कृपासागर भगवान श्रीराम की शरण में जा।
यदि तू श्रीराम का द्रोही बन गया, तो ब्रह्मा और रुद्र भी तुझे नहीं बचा सकते।
मूर्ख! व्यर्थ की डींग मत हाँक, राम से बैर रखने का परिणाम अत्यंत भयानक होगा।
तेरा सिर वानरों के सामने धरती पर गिरेगा और राम के बाण लगते ही वे सिर गेंद की तरह खेलेंगे।
जब रणभूमि में रघुनाथ क्रोध करेंगे और भयानक बाण छोड़ेंगे, तब क्या तेरी यह घमंडी बातें टिक पाएँगी?
इसलिए सोच-समझकर दयालु राम का भजन कर।”
यह सुनकर रावण क्रोध से ऐसे जल उठा, जैसे अग्नि में घी डाल दिया गया हो।
2️⃣ विस्तृत विवेचन
🔸 (क) नीति और भक्ति का उपदेश
अंगद रावण को अहंकार त्यागकर भक्ति अपनाने की सलाह देते हैं।
“कृपासिंधु रघुराई” → श्रीराम केवल योद्धा नहीं, करुणा के सागर हैं
संकेत: अभी भी शरण में जाए तो उद्धार संभव है
🔸 (ख) द्रोह का परिणाम
“ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही”
यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि
जो श्रीराम का विरोधी बनता है
उसे कोई देवता भी नहीं बचा सकता
➡️ यह दैवी न्याय (Divine Justice) का सिद्धांत है
🔸 (ग) रावण के अहंकार पर प्रहार
अंगद रावण की डींगों को मूर्खता कहते हैं।
राम से बैर = सर्वनाश
यह केवल व्यक्तिगत युद्ध नहीं, अधर्म बनाम धर्म का संग्राम है
🔸 (घ) युद्ध का भयावह भविष्यचित्र
अंगद भविष्यवाणी करते हैं—
रावण के सिर कटकर गिरेंगे
वानर और भालू उन्हें गेंद की तरह खेलेंगे
➡️ यह रावण के अहंकार के पतन का प्रतीक है
🔸 (ङ) अंतिम चेतावनी
“अस बिचारि भजु राम उदारा”
अंगद अंतिम अवसर देते हैं—
अभी भी समय है
राम उदार हैं, क्षमा कर सकते हैं
🔸 (च) रावण की प्रतिक्रिया
रावण पर इस सत्य वचन का उल्टा प्रभाव पड़ता है—
उसका अहंकार और भड़क उठता है
सत्य उसे शीतल नहीं करता, बल्कि अग्नि में घी बन जाता है
3️⃣ मुख्य संदेश (सार)
अहंकार विवेक का नाश करता है
श्रीराम का विरोध = आत्मविनाश
अंतिम क्षण तक धर्म का द्वार खुला रहता है
परंतु अहंकारी उसे स्वयं बंद कर देता है
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