लंका काण्ड दोहा (24)

 लंका काण्ड दोहा 24 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।

फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।।23(क)।।

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।

कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।23(ख)।।

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।

जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।23(ग)।।

जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष।

तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।23(घ)।।

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस।

प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस।।23(ङ)।।

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।

जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।23(छ)।।

दोहा 23(क) – भावार्थ

अंगद रावण से व्यंग्य से कहता है:

हे रावण! क्या सचमुच कपि (हनुमान) ने प्रभु राम की आज्ञा बिना पाए लंका जलाई,

परंतु इस कारण से वह सुग्रीव के पास नहीं गया, कहीं जाकर छुप गया।

विवेचन

अंगद यहाँ रावण के आरोप को काटता है। वह स्पष्ट करता है कि हनुमान का कार्य

भयजनित नहीं, अपितु राम-प्रताप से उत्पन्न पराक्रम है।

🔸 दोहा 23(ख) – भावार्थ

हे दशानन! सब लोग सत्य ही कहते हैं, पर तुम क्रोध में सत्य नहीं सुनते।

तुम्हारी पूरी सेना में कोई ऐसा योद्धा नहीं जो उस कपि से युद्ध कर सके।

विवेचन

अंगद रावण के अहंकार को उजागर करता है और

हनुमान के अतुल बल का निर्भीक वर्णन करता है।

🔸 दोहा 23(ग) – भावार्थ

प्रीति और विरोध—दोनों में नीति समान होनी चाहिए।

जैसे यदि सिंह मेंढकों का वध करे, तो कोई उसे वीर नहीं कहेगा।

विवेचन

अंगद व्यंग्यपूर्वक समझाता है कि

महान का छोटे से लड़ना नीति के विरुद्ध है,

यहाँ सिंह राम हैं और मेंढक रावण की सेना।

प्रीति और विरोध—दोनों में नीति समान होनी चाहिए।

जैसे यदि सिंह मेंढकों का वध करे, तो कोई उसे वीर नहीं कहेगा।

🔸 दोहा 23(घ) – भावार्थ

अंगद कहता है तुम जैसे तुच्छ को मारना राम को शोभा नहीं देता, परंतु तुमने क्षत्रिय क्रोध को नहीं देखा है।

विवेचन

अंगद बताता है कि रावण का क्रोध

धर्म नहीं, अहंकार से प्रेरित है।

🔸 दोहा 23(ङ) – भावार्थ

अंगद की वाणी धनुष और बाण की तरह तीखी थी,

जिससे रावण के हृदय में शत्रुता की आग भड़क उठी।

विवेचन

यहाँ शब्द-युद्ध का चित्रण है।

अंगद की सत्ययुक्त वाणी रावण को भीतर से जला देती है।

🔸 दोहा 23(छ) – भावार्थ

तब रावण हँसकर बोला—

कपि का एक महान गुण है कि

वह अपने स्वामी के हित के लिए अनेक उपाय करता है।

🔹 समग्र भाव

इन दोहों में—

अंगद की नीति, निर्भीकता और दूत-धर्म,

हनुमान की भक्ति और पराक्रम,

तथा रावण का अहंकार

स्पष्ट रूप से प्रकट होता है।


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