लंका काण्ड चौपाई (245-252)
लंका काण्ड चौपाई 245-252 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।।
नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा।।
मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा।।
बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा।।
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा।।
जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा।।
तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा।।
हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू।।
भावार्थ :
रावण कहता है—
वानरों जैसे तुच्छ प्राणियों को साथ लेकर समुद्र बाँध देना ही क्या प्रभुता है?
पक्षी भी कई बार समुद्र लाँघ जाते हैं, पर वे सूर्य नहीं बन जाते।
मेरी भुजाओं में समुद्र जैसा अपार बल है, जिसमें अनेक देवता, मनुष्य और वीर डूब चुके हैं।
बीसों समुद्र भी अथाह हैं—पर ऐसा कौन-सा वीर है जो उन्हें पार कर ले?
मैंने दिग्पालों से भी जल भरवाया है और राजाओं का यश सुनकर भी मुझे हँसी आती है।
यदि तुम्हारे स्वामी (राम) सचमुच महान योद्धा हैं, जिनके गुण तुम बार-बार गाते हो,
तो फिर दूत बनाकर भेजने की क्या आवश्यकता थी?
शत्रु से प्रेम करना लज्जाजनक है।
मेरी भुजाओं का बल देखो—मैं पर्वतों को मथने वाला हूँ।
हे मूर्ख कपि! जाकर अपने प्रभु की ही प्रशंसा करो।
🔹 विस्तृत विवेचन
रावण का अहंकार
रावण समुद्र-सेतु को तुच्छ बताकर राम की प्रभुता को नकारता है। वह मानता है कि यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं।
उपमा और तर्क का दुरुपयोग
पक्षियों द्वारा समुद्र लाँघने का उदाहरण देकर वह कहता है कि हर समुद्र लाँघने वाला महान नहीं हो जाता—यह कुटिल तर्क है।
अतिशयोक्ति से भरा आत्मगौरव
अपने भुजबल को समुद्र से भी बड़ा बताना, देवताओं को डुबो देने की डींग—यह रावण के अंधे अहंकार को दर्शाता है।
राम की नीति का अपमान
दूत भेजने को कमजोरी बताना रावण की मूढ़ता है। वह धर्म, नीति और करुणा को दुर्बलता समझता है।
अहंकार बनाम भक्ति
रावण बल को सब कुछ मानता है, जबकि राम धर्म, मर्यादा और नीति के प्रतीक हैं। यही अंतर आगे उसके विनाश का कारण बनता है।
काव्य-सौंदर्य
तुलसीदास ने यहाँ रावण के संवाद से उसके पतन के बीज दिखा दिए हैं—अत्यधिक गर्व अंततः नाश करता है।
🔹 निष्कर्ष
यह चौपाई सिखाती है कि
👉 अहंकार बुद्धि को नष्ट कर देता है,
👉 बल बिना धर्म के विनाशकारी होता है,
👉 और रावण का पतन उसके इसी गर्व से निश्चित हो जाता है।
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