लंका काण्ड दोहा (25)

 लंका काण्ड दोहा 25 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख।

इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।24।।

भावार्थ :

अंगद कहते हैं—  एक बात कहते हुए मुझे संकोच होता है कि तूं वही रावण है, जिसे बालि ने अपने कांख में दबाकर रखा था। अब तुम्हीं बताओ कि तुम कौन-सा रावण हो?

विवेचन :

यहाँ अंगद बालि–रावण प्रसंग याद दिलाते हैं, जब बालि ने रावण को काँख में दबाकर अपमानित किया था। अंगद यह दिखाना चाहते हैं कि—जिस रावण की यह दशा हो चुकी, उसके सामने वानर-वीरों से डरने का कोई कारण नहीं। यह दोहा रावण के अहंकार को तोड़ने और उसकी पुरानी हार याद दिलाने के लिए कहा गया है।

      रावण की सारी पुरानी पराजय को  याद दिलाकर अंगद उसके घमंड को तोड़ना चाहते हैं, ताकि वह सही मार्ग अपना लें।


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