लंका काण्ड दोहा (26)
लंका काण्ड दोहा 26 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान।
रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।25।।
भावार्थ
रावण क्रोध में अंगद से कहता है—
“तू मुझे तुच्छ समझकर किसी साधारण मनुष्य (राम) की बढ़ाई कर रहा है।
अरे कपि! तू तो असभ्य, दुष्ट और नीच है। अब मैं तेरी बुद्धि और ज्ञान को समझ गया।”
विस्तृत विवेचन
यह दोहा रावण के अहंकार, अज्ञान और क्रोध को स्पष्ट करता है।
राम को ‘नर’ कहना
रावण भगवान राम को केवल मनुष्य मानकर उनकी महिमा को कम आंक रहा है। यही उसका अज्ञान (अविद्या) है, क्योंकि राम साधारण नर नहीं, साक्षात् परमात्मा हैं।
अंगद के प्रति अपमान
अंगद ने नीति, धर्म और सत्य के आधार पर रावण को समझाने का प्रयास किया था, परंतु रावण ने उसे “कपि, बर्बर, खल” कहकर अपमानित किया। इससे रावण की दुष्ट प्रवृत्ति और अहंकार प्रकट होता है।
अहंकार का अंधापन
रावण इतना अहंकारी हो चुका है कि सत्य उसे कटु लगता है। वह हितकारी वचन को भी अपमान समझता है। यही अहंकार आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनता है।
नीति-संदेश
यह दोहा सिखाता है कि
जो व्यक्ति अहंकार में डूबा होता है, वह सत्य को पहचान नहीं पाता।
सज्जनों की सलाह को ठुकराने वाला अंततः पतन को प्राप्त होता है।
सार
यह दोहा रावण के अहंकारयुक्त अज्ञान और अंगद की सत्यनिष्ठा के टकराव को दर्शाता है। तुलसीदास जी यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर की महिमा को न पहचानना ही सबसे बड़ा दोष है, और वही विनाश का मूल कारण बनता है।
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