लंका काण्ड दोहा (28)
लंका काण्ड दोहा 28 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि।।27।।
भावार्थ
रावण कहता है— कुंभकर्ण जैसा मेरा भाई है और इंद्र का शत्रु कहलाने वाला मेघनाद मेरा पुत्र है। फिर भी तुमने मेरे पराक्रम का नाम तक नहीं सुना? मैंने अपने बल से समस्त चराचर जगत् को जीत लिया है।
विस्तृत विवेचन
इस दोहे में रावण का घमंड और अहंकार स्पष्ट दिखाई देता है। अंगद के उपदेश और चेतावनी के बाद भी रावण अपनी शक्ति का बखान करता है। वह अपने कुल-पराक्रम का उल्लेख करके सामने वाले को डराना चाहता है।
कुंभकर्ण का उल्लेख –
कुंभकर्ण रावण का भाई है, जो अत्यंत बलशाली और पराक्रमी माना जाता है। रावण उसे अपनी शक्ति का प्रमाण बताकर यह जताता है कि उसका परिवार ही वीरों से भरा है।
मेघनाद (इंद्रजित) का गौरव –
“प्रसिद्ध सक्रारि” कहकर रावण अपने पुत्र मेघनाद की वीरता बताता है, जिसने इंद्र को पराजित किया था। इससे रावण अपने वंश की युद्ध-शक्ति को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता है।
अपने पराक्रम का दंभ –
रावण कहता है कि उसने चराचर (जड़-चेतन) समस्त जगत् को जीत लिया है। यह कथन उसके अत्यधिक अहंकार को दर्शाता है, क्योंकि वह ईश्वर-सत्ता और मर्यादा को भूल चुका है।
मूल संदेश –
तुलसीदास यहाँ यह दिखाते हैं कि अहंकार विवेक को ढँक देता है। रावण अपनी शक्ति में इतना डूबा है कि उसे श्रीराम की महिमा और धर्म का बोध नहीं हो रहा। यही अहंकार अंततः उसके विनाश का कारण बनता है।
निष्कर्ष:
यह दोहा रावण के आत्ममुग्ध स्वभाव को उजागर करता है और यह शिक्षा देता है कि बल और कुल-गौरव पर गर्व करने वाला व्यक्ति सत्य और धर्म से दूर हो जाता है।
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