लंका काण्ड चौपाई (118-125)

 लंका काण्ड चौपाई 118-125 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई — कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।।

सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी।।

दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।।

सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही।।

सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई।।

मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ।।

सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी।।

कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू।।

भावार्थ :

भगवान राम के बाण जब रावण का छत्रक, मुकुट और ताटंक को गिराकर वापस तरकश में लौट आया,यह किसी को भी दिखाई  नहीं दिया।

लंकापुरी में अचानक भयानक अशुभ संकेत प्रकट हुए। न धरती काँप रही थी, न वायु का कोई विक्षोभ था, न ही अस्त्र–शस्त्र दिखाई दे रहे थे; परन्तु सबके मन में एक अज्ञात भय भर गया—भारी अशुभ का संकेत। ये एक दिव्य अदृश्य संकेत था कि कोई बड़ी अनिष्ट घटना होने वाली है।

सभा में उपस्थित राक्षस डरे हुए थे। रावण ने उन सबको भयभीत देखकर हँसते हुए दिखावटी धैर्य और छलपूर्ण बुद्धि से कहा—“राजाओं के मुकुट गिरना सदैव शुभ का संकेत है, यह अशुभ नहीं, तुम सब अपने घर जाकर आराम करो।”

सभी राक्षस रावण को प्रणाम कर चले गए। किंतु मंदोदरी के हृदय में गहरी चिंता बैठ गई। वह पहले से ही रावण द्वारा श्रीराम का विरोध करने पर अशुभ परिणामों का अनुमान रखती थी। आँसू भरे नेत्रों से, हाथ जोड़कर उसने विनती की—

हे स्वामी! राम के विरोध को त्याग दीजिए। मनुष्य समझकर उन्हें तुच्छ न मानिए। हट और अहंकार छोड़ दीजिए, क्योंकि यह अनर्थ का मार्ग है।

विस्तृत विवेचन

यह चौपाई उस समय की स्थिति दिखाती है जब रावण के अंत का समय निकट है। श्रीराम लंका के द्वार पर हैं, और प्रकृति स्वयं संकेत कर रही है कि धर्म का समय आ गया है और अधर्म का विनाश निकट है।

यहाँ असगुन अर्थात अशुभ शकुन—दुर्भाग्यसूचक घटना का वर्णन है।

लोक में यह मान्यता है कि राजा का मुकुट गिरना, सिंहासन डोलना, राज्य में भय का वातावरण छा जाना — राज्य के विनाश का संकेत है।

रावण की हँसी उसका अहंकार दर्शाती है। वह सत्य को समझते हुए भी हठ और अभिमान में उसे नकार देता है।

मंदोदरी केवल पत्नी नहीं, सद्बुद्धि का स्वरूप है। वह धर्म और न्याय की बात करती है और रावण को सचेत करना चाहती है।

परंतु अहंकारी व्यक्ति सलाह स्वीकार नहीं करता, इसलिए रावण के कानों पर यह बात असर नहीं करती और विनाश निश्चित हो जाता है।

इस प्रसंग से संदेश मिलता है:

1. अहंकार बुद्धि नष्ट कर देता है, जिससे सत्य दिखते हुए भी दिखाई नहीं देता।

2. सत्पथ की सलाह को अस्वीकार करने वाला अंततः विनाश को प्राप्त होता है।

निष्कर्ष

यह चौपाई राम और रावण के युद्धपूर्व वातावरण का अत्यंत मार्मिक चित्र है—जहाँ धैर्य और धर्म की आवाज मंदोदरी देती है लेकिन रावण के हठ के कारण लंका विनाश की ओर बढ़ती है।


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