लंका काण्ड चौपाई (253-262)

 लंका काण्ड चौपाई (253-262) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।।

नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची।।

सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें।।

आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे।।

कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं।।

लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ।।

सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही।।

सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली।।

सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा।।

इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा।।

भावार्थ (सरल अर्थ)

अंगद कहते हैं—

“जब मैंने देखा कि विधि ने तुम्हारे माथे पर मृत्यु का लेख लिख दिया है, तभी समझ गया कि अब तुम्हारा अंत निश्चित है। मनुष्य अपने ही कर्मों से अपना विनाश लिखता है। यह जानकर मैं हँसा कि विधि की वाणी कभी असत्य नहीं होती।

मैंने मन में सोच लिया कि अब मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है, क्योंकि ब्रह्मा ने तुम्हारे लिए जो भाग्य लिखा है, वह मूर्खतापूर्ण और अटल है। फिर भी तुम बार-बार अपने बल और पराक्रम की डींगें मारते हो और अपने ही सामने वीरों का अपमान करते हो—यह लज्जा त्यागने जैसा है।

अंगद लज्जा के साथ कहता है—इस संसार में तुम जैसा अभिमानी कोई नहीं। लज्जा तुम्हारे स्वभाव में है ही नहीं, इसलिए तुम अपने ही मुख से अपने गुणों का बखान करते रहते हो।

तुम बार-बार अपने सिर काटने और पर्वत उठाने की कथा सुनाते हो, सहस्रबाहु और बालि को जीतने का गर्व करते हो। पर हे मंदबुद्धि! अब निर्णय करो—क्या तुम वास्तव में शूरवीर हो तो युद्ध में सिर कटवाओ।

इंद्रजाल या माया से किया गया काम वीरता नहीं कहलाता। जो सच में वीर होता है, वह अपने शरीर के अंग काटकर नहीं दिखाता, बल्कि धर्म और मर्यादा के लिए युद्ध करता है।”

🔹 विस्तृत विवेचन

यह चौपाई अंगद के तेजस्वी, निर्भीक और धर्मयुक्त व्यक्तित्व को प्रकट करती है। अंगद यहाँ रावण के अहंकार, आत्मप्रशंसा और माया-बल पर करारा प्रहार करते हैं।

विधि और कर्म का सिद्धांत

अंगद स्पष्ट करते हैं कि रावण का विनाश उसके अपने कर्मों का फल है। विधि (भाग्य) की लेखनी अटल है—जो बोया है वही काटना होगा।

रावण का अहंकार

रावण बार-बार अपने पराक्रम—सिर काटना, पर्वत उठाना, सहस्रबाहु और बालि को हराना—का बखान करता है। अंगद इसे लज्जा का त्याग और अभिमान की पराकाष्ठा बताते हैं।

सच्ची वीरता की परिभाषा

अंगद कहते हैं कि माया, छल और इंद्रजाल से विजय पाना वीरता नहीं है। सच्चा शूरवीर वह है जो धर्म के लिए, मर्यादा के लिए, खुले युद्ध में प्राण देता है।

धर्म बनाम अधर्म

रावण का बल अधर्म पर आधारित है, इसलिए उसका अंत निश्चित है। वहीं राम की शक्ति धर्म, सत्य और करुणा से जुड़ी है—जो सदा विजयी होती है।

🔹 निष्कर्ष

यह चौपाई हमें सिखाती है कि

अहंकार विनाश का कारण है,

सच्ची वीरता त्याग और धर्म में है,

और माया-बल स्थायी नहीं होता।

अंगद के वचन रावण के लिए चेतावनी हैं, पर वह उसे समझ नहीं पाता—और यही उसके पतन का मूल कारण बनता है।

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