लंका काण्ड चौपाई (263-270)

 लंका काण्ड चौपाई 263-270 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।।

दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीष पठायउँ।।

बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला।।

मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे।।

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा।।

जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी।।

तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता।।

जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ।।

भावार्थ:

अंगद रावण से कहता है—हे दुष्ट! अब व्यर्थ की डींग मत हाँक, मेरी बात सुन और अपना अभिमान छोड़। मैं स्वयं दूत बनकर नहीं आया हूँ, बल्कि यह सोचकर आया हूँ कि रघुकुल-श्रेष्ठ श्रीराम ने मुझे भेजा है। करुणामय श्रीराम ने बार-बार समझाया है कि बिना कारण किसी का वध नहीं होता। मैंने मन में प्रभु की आज्ञा समझकर तेरे कठोर वचनों को सह लिया। नहीं तो अभी तेरा मुख तोड़कर सीता को बलपूर्वक ले जा सकता था। तेरे बल को मैं जानता हूँ, अधम! तू दूसरों की स्त्रियों को हर लाने में ही वीरता समझता है। तू राक्षसों का राजा है, तुझे बहुत गर्व है; और मैं रघुपति का सेवक और दूत हूँ। यदि मुझे राम के अपमान का भय न होता, तो तेरे सामने ही बड़ा अद्भुत पराक्रम दिखा देता।

विवेचन:

इस चौपाई में अंगद का तेज, मर्यादा और राम-भक्ति स्पष्ट होती है। वह रावण की अहंकारपूर्ण बातों को अस्वीकार कर उसे चेतावनी देता है कि दूत होने के कारण ही वह संयम रखे हुए है। अंगद यह स्पष्ट करता है कि राम करुणामय हैं और बिना कारण युद्ध नहीं चाहते, पर अन्याय सहना भी उनका स्वभाव नहीं। रावण के बल को जानते हुए भी अंगद उसे तुच्छ सिद्ध करता है और यह बताता है कि सच्चा बल धर्म और मर्यादा में है, न कि परनारी हरण में। अंत में अंगद यह स्थापित करता है कि वह अपने व्यक्तिगत पराक्रम से नहीं, बल्कि राम की आज्ञा और मर्यादा से बँधा हुआ है—यही रामभक्ति की सर्वोच्चता है।

Comments

Popular posts from this blog

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

लंका काण्ड चौपाई (229-236)

लंका काण्ड दोहा (27)