लंका काण्ड चौपाई (271-278)

 लंका काण्ड चौपाई (271-278) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।।

कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।।

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी।।

तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी।।

अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही।।

सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा।।

रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी।।

कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें।।

भावार्थ

अंगद रावण से कहते हैं—

यदि ऐसे नीच व्यक्ति का वध भी कर दिया जाए, तो उसमें कोई बड़ाई नहीं, क्योंकि ऐसे लोगों को मारने से मनुष्यता का यश नहीं बढ़ता। जो कामवासना में डूबा, कृपण, मूर्ख, अत्यंत दरिद्र (गुणों में), अपयशी और बुद्धि से बूढ़ा हो; जो सदा रोगग्रस्त, क्रोधी, विष्णु-विमुख, वेद-संतों का विरोधी हो; जो केवल शरीर का पोषण करे, दूसरों की निंदा करे, पापों की खान हो—ऐसा जीवन तो पशु समान है।

इसी विचार से मैं तुझे नहीं मार रहा; अब तू मुझे क्रोधित मत कर।

यह सुनकर रावण क्रोध से भर उठता है—दाँत पीसता, होंठ दबाता, हाथ मलता हुआ कहता है: “अरे नीच वानर! तू मरना चाहता है? छोटे शरीर वाला होकर बड़ी-बड़ी बातें करता है। कड़वी और मूर्खतापूर्ण बातें बोलता है; तेरे पास न बल है, न प्रताप, न बुद्धि, न तेज।”

विवेचन

यहाँ अंगद की वाणी में नीति और धर्म प्रकट होता है। वे रावण को बताते हैं कि अधर्मी, कामासक्त और विष्णु-विमुख व्यक्ति का जीवन मानव-गरिमा से गिरा हुआ होता है; ऐसे का वध वीरता नहीं। यह सच्चे क्षत्रिय धर्म का संकेत है—अकारण वध नहीं।

दूसरी ओर, रावण का अहंकार और क्रोध उजागर होता है। सत्य सुनते ही वह विवेक खो देता है और अपशब्दों पर उतर आता है। तुलसीदास जी ने यहाँ दिखाया है कि अहंकार सत्य का शत्रु होता है; जो सत्य सह न सके, वह क्रोध और अपमान का सहारा लेता है।

इस प्रसंग से संदेश मिलता है कि धर्म, विवेक और संयम ही सच्ची शक्ति हैं, जबकि अहंकार अंततः विनाश का कारण बनता है।


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