लंका काण्ड चौपाई (279-288)

 लंका काण्ड चौपाई 279-288 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।।

हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।।

कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी।।

डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे।।

गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।।

कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।।

आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे।।

की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।।

कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू।।

ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे।।

भावार्थ:

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका काण्ड का अत्यन्त ओजस्वी और शिक्षाप्रद प्रसंग है। यहाँ रावण की सभा में श्रीराम की निंदा होने पर अंगद जी का क्रोध, पराक्रम और रामभक्ति एक साथ प्रकट होते हैं।

1. रावण की निंदा और अंगद का क्रोध

रावण अहंकार में चूर होकर जब श्रीराम की निंदा करता है, तब अंगद जी यह सहन नहीं कर पाते।

रामभक्त के लिए प्रभु का अपमान अपने प्राणों से भी अधिक असह्य होता है।

तुलसीदास जी कहते हैं —

“हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।”

अर्थात जो व्यक्ति भगवान की निंदा सुनकर भी मौन रहता है, वह भी महापाप का भागी होता है।

इसी धर्मबोध से प्रेरित होकर अंगद जी क्रोधित हो उठते हैं।

2. अंगद का भुजबल और सभा में हड़कम्प

अंगद जी क्रोध में अपने दोनों विशाल भुजदंडों से पृथ्वी पर प्रहार करते हैं —

“कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥”

उनके प्रहार से धरती डोल उठती है, सभा काँपने लगती है, राक्षस भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं।

यह दृश्य बताता है कि धर्म की शक्ति के सामने अधर्म का वैभव भी टिक नहीं पाता।

3. रावण का पतन और मुकुटों का गिरना

भूकंप जैसे कम्पन से स्वयं रावण भी संभल नहीं पाता और भूमि पर गिर पड़ता है।

उसके सिर से सुंदर मुकुट गिरकर धरती पर बिखर जाते हैं।

यह केवल शारीरिक पतन नहीं है —

यह रावण के अहंकार, घमंड और राजवैभव के चूर-चूर होने का प्रतीक है।

4. अंगद द्वारा मुकुट श्रीराम के पास भेजना

अंगद जी उन मुकुटों को उठाकर श्रीराम के पास भेज देते हैं।

यह संदेश है कि —

“जिस रावण को तुम अजेय समझते हो, उसका वैभव प्रभु के चरणों में तुच्छ है।”

यह राम की सर्वोच्चता और धर्म की विजय का प्रतीक बन जाता है।

5. श्रीराम की करुणा और निर्भयता

जब वानर मुकुटों को आते देखकर भयभीत हो जाते हैं, तब श्रीराम मुस्कराकर कहते हैं —

“जनि हृदयँ डेराहू।

लूक न असनि केतु नहिं राहू॥”

अर्थात —

डरो मत, यह न बिजली है, न ग्रहण का केतु —

ये तो रावण के मुकुट हैं, जिन्हें अंगद ने भेजा है।

यहाँ प्रभु का करुण, शांत और निर्भय स्वरूप प्रकट होता है।

आध्यात्मिक संदेश

रामनिंदा अधर्म है — और उसका विरोध करना धर्म है।

अहंकार का अंत निश्चित है — चाहे वह रावण जैसा ही क्यों न हो।

भक्ति में अपार शक्ति होती है — अंगद जैसे युवा योद्धा भी अधर्म की नींव हिला सकते हैं।

श्रीराम धर्म, करुणा और सत्य के साक्षात स्वरूप हैं।

निष्कर्ष

यह प्रसंग अंगद के शौर्य, रामभक्ति और रावण के अहंकार-भंग का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण है।

यह बताता है कि जब धर्म जागता है, तो अधर्म स्वयं धराशायी हो जाता है।

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