लंका काण्ड चौपाई (289-297)
लंका काण्ड चौपाई 289-297 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।।
मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई।।
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा।।
मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती।।
रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी।।
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा।।
याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें।।
रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।।
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं।।
भावार्थ (सरल अर्थ)
रावण क्रोध में अपने वीरों को आदेश देता है—
“इस प्रकार शीघ्र ही सब योद्धा दौड़ पड़ो और जहाँ-जहाँ वानर और भालू मिलें, उन्हें खा जाओ। धरती को वानर-शून्य कर दो। उन दोनों तपस्वी भाइयों (राम–लक्ष्मण) को जीवित पकड़ लाओ।”
क्रोधित होकर युवराज अंगद कहता है—
“अरे निर्लज्ज! मेरे सामने डींग मारते हुए तुझे लज्जा नहीं आती? तू कुलघाती है, गला काटने योग्य है। मेरे बल को देखकर भी तेरा हृदय नहीं काँपता?”
इसके बाद वह अंगद रावण को अपमानित करते हुए कहता है:-
“अरे स्त्री-चोर, कुमार्गगामी, पापी, मंदबुद्धि और कामी! तू व्यर्थ प्रलाप कर रहा है। तू काल के वश में आ गया है। इसका फल तुझे आगे मिलेगा, जब वानर और भालू तुझे चारों ओर से दबोच लेंगे।”
अंत में अंगद कहता है—
“राम को मनुष्य बोलता है, तेरी जीभ क्यों नहीं गिर जाती? निश्चय ही युद्धभूमि में सिर समेत तेरी जीभ गिर पड़ेगी।”
विस्तृत विवेचन
यह चौपाई लंका काण्ड के उस प्रसंग की है, जब अंगद रामदूत बनकर रावण की सभा में जाकर उसे समझाने का प्रयास करते हैं। अंगद की निर्भीक वाणी और राम के पराक्रम का वर्णन सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हो उठता है।
1. रावण का अहंकार और क्रूरता
रावण अपने योद्धाओं को आदेश देता है कि वानर-भालुओं को जहाँ कहीं देखो, मार डालो और धरती को उनसे रहित कर दो। इससे उसका अत्याचारी और निर्दयी स्वभाव प्रकट होता है।
वह राम और लक्ष्मण को “तपस्वी” कहकर उनका उपहास करता है और उन्हें जीवित पकड़ लाने का आदेश देता है।
➡️ यह दर्शाता है कि रावण अपने अहंकार में इतना डूबा है कि उसे राम की दिव्य शक्ति का लेशमात्र भी भय नहीं।
2. अंगद रावण को अपमानजनक भाषा कहता है
अंगद रावण को अनेक कटु शब्द कहता है—
कुलघाती
निर्लज्ज
स्त्री-चोर
पापी
मंदबुद्धि
कामी
अंगद रावण को समझाने का प्रयास करता है और कहता है कि उसके सामने किसी की छाती काँप जाती है।
➡️ वास्तव में यह रावण की भीतरी घबराहट को प्रकट करता है। जब तर्क और बल दोनों से हारने लगता है, तब वह गाली-गलौज पर उतर आता है।
3. अंगद की निर्भीकता का प्रभाव
अंगद निर्भय होकर राम की महिमा और रावण के विनाश का संकेत दे चुके होते है
अंगद रावण को कहता है कि युद्धभूमि में रावण की जीभ और सिर गिर पड़ेगा।
➡️ रावण को अहंकारपूर्ण भ्रम है, क्योंकि आगे चलकर वही रावण राम के बाणों से मारा जाता है।
4. नीति-संदेश
यह चौपाई हमें सिखाती है कि—
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता है।
सत्य और धर्म के सामने अधर्म का अंत निश्चित है।
रावण की वाणी में क्रूरता, अहंकार और अज्ञान झलकता है, जबकि अंगद धर्म, साहस और सत्य के प्रतिनिधि हैं।
निष्कर्ष
यह चौपाई रावण के घमंड, क्रोध और अधर्म को उजागर करती है तथा यह सिद्ध करती है कि जब अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, तभी उसका विनाश निश्चित हो जाता है।
अंगद की निर्भीकता राम के धर्मबल का प्रतीक है, और रावण की उग्र वाणी उसके पतन का संकेत।
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