लंका काण्ड दोहा (29)

 लंका काण्ड दोहा 29 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।

हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।

भावार्थ

रावण अपनी बड़ाई करते हुए कहता है कि उसके जैसा वीर कौन है, जिसने अपने ही हाथ से अपना सिर काटकर शिव को अर्पित किया। उस समय शिव अत्यंत प्रसन्न हुए; इस घटना के साक्षी स्वयं गौरीपति (भगवान शिव) हैं।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा रावण के तप, साहस और शिवभक्ति को रेखांकित करता है। रावण अपनी ही शक्ति और महिमा स्मरण कराता है कि उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठोर तप किया—यहाँ तक कि स्वहस्त से सिर काटकर आहुति दी। इससे रावण का अदम्य पराक्रम, त्याग और तपोबल प्रकट होता है।

शिव का “अति हरष” होना बताता है कि रावण की भक्ति सच्ची और असाधारण थी, और शिव स्वयं उसके साक्षी हैं। परोक्ष संदेश यह है कि इतनी महान भक्ति और शक्ति के होते हुए भी यदि अहंकार और अधर्म का मार्ग अपनाया जाए, तो विनाश अवश्यंभावी है। अंगद रावण को चेताते हैं कि अपनी इसी महिमा को याद कर विवेक से काम ले।

सार:

रावण की भक्ति महान थी, पर अहंकार ने उसे धर्म से विचलित किया—यही इस दोहे की शिक्षा है।

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