लंका काण्ड चौपाई (298-311)

 लंका काण्ड चौपाई 298-311 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।।

असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।।

गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।।

मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।।

जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।।

बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।।

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।।

समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।।

जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।।

सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।।

इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।।

झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई।।

पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।।

पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।।

यह प्रसंग उस समय का है जब श्रीराम जी ने अंगद जी को दूत बनाकर लंका भेजा। अंगद जी रावण को अंतिम अवसर देने आए थे कि वह माता सीता लौटा दे और राम की शरण स्वीकार कर ले।

पर रावण अहंकार में डूबा हुआ था। तब अंगद जी ने अपने तेज, पराक्रम और राम-प्रताप का प्रदर्शन किया।

🔹 चौपाइयों का भावार्थ व विवेचन

1.

"मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।।"

👉 अंगद कहते हैं —

मैं तुम्हारे दाँत तोड़ने योग्य हूँ, पर श्रीराम की आज्ञा नहीं है, इसलिए अभी तुम्हें दंड नहीं दे रहा।

🔹 यहाँ अंगद की शक्ति और मर्यादा दोनों दिखाई देती हैं।

2.

"असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।।"

👉 यदि क्रोध करूँ तो तुम्हारे दसों सिर तोड़ दूँ और पूरी लंका को समुद्र में डुबो दूँ।

🔹 यह राम-दूत के पराक्रम का संकेत है।

3.

"गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।।"

👉 तुम्हारी लंका गूलर के फल जैसी तुच्छ है और तुम उसमें छोटे जीव जैसे रहते हो।

🔹 रावण के वैभव को तुच्छ बताया गया है।

4.

"मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।।"

👉 मैं वानर हूँ, फल खाना मेरा स्वभाव है, पर राम की आज्ञा बिना कुछ नहीं करता।

🔹 यह भक्ति और अनुशासन का प्रतीक है।

5-6

जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।।

बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।।

रावण अंगद को झूठा और डरपोक कहता है, और बालि से तुलना कर अपमान करता है।

🔹 यह रावण का अहंकार और अज्ञान दिखाता है।

7.

"साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।।"

👉 यदि मैं तुम्हारे दसों सिर न उखाड़ूँ तो मुझे झूठा समझना।

🔹 यह अंगद की वीर-प्रतिज्ञा है।

8.

"समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।।"

👉 अंगद राम-प्रताप को स्मरण कर सभा में पैर जमा देते हैं।

🔹 यह राम-शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

9.

"जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।।"

👉 यदि कोई मेरा पैर हटा दे तो राम सीता लौट जाएँ।

🔹 यह आत्मविश्वास की पराकाष्ठा है।

10--14

सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।।

इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।।

झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई।।

पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।।

पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।।

रावण अपने वीरों को आदेश देता है — अंगद को गिराओ।

इंद्रजीत जैसे महाबली भी असफल हो जाते हैं।

🔹 इससे सिद्ध होता है कि

राम-दूत अजेय है।

🌟 इस प्रसंग का संदेश

रामभक्ति से बड़ा कोई बल नहीं।

अहंकार विनाश का मूल है।

धर्म के दूत को कोई हरा नहीं सकता।

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