लंका काण्ड दोहा (30)
लंका काण्ड दोहा 30 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।
ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।29।।
भावार्थ :
जो लोग मोह के वश में पड़कर पतंगे की तरह आग में जल जाते हैं और गधे जैसे भारी बोझ ढोते रहते हैं, वे कभी भी वीर (सूर) नहीं कहलाते। हे मूर्ख! समझकर देख—सच्चा पराक्रम विवेक से होता है, अंधे आवेश से नहीं।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा अंगद द्वारा रावण को समझाने के प्रसंग में आता है। अंगद यहाँ रावण के अहंकार और अविवेकपूर्ण साहस पर करारा व्यंग्य करते हैं।
‘पतंग’ का दृष्टांत –
पतंगा प्रकाश के मोह में आग के पास जाता है और जलकर नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति मोह, अहंकार या कामना में अंधा होकर विनाशकारी मार्ग चुनता है, उसका अंत भी पतंगे जैसा होता है। यह साहस नहीं, मूर्खता है।
‘खर बृंद’ (गधों का झुंड) –
गधा भारी बोझ ढोता है, पर उसमें न विवेक होता है न स्वतंत्र निर्णय। अंगद कहते हैं कि जो लोग बिना सोचे-समझे दूसरों के बोझ (अहं, आदेश, दुष्कर्म) ढोते रहते हैं, वे वीर नहीं कहलाते।
सूर की परिभाषा –
सच्चा वीर वही है जिसमें बल के साथ बुद्धि, पराक्रम के साथ विवेक और शक्ति के साथ धर्म हो। केवल जिद, आवेश और घमंड से किया गया कर्म वीरता नहीं है।
रावण पर संकेत –
अंगद अप्रत्यक्ष रूप से रावण को चेतावनी दे रहे हैं कि राम से बैर लेना मोह और अहंकार का परिणाम है। यह मार्ग उसे विनाश की ओर ले जाएगा, इसलिए अभी भी विवेक से काम ले।
निष्कर्ष:
यह दोहा हमें सिखाता है कि अंधा साहस विनाशकारी होता है। विवेकहीन पराक्रम न वीरता है, न महिमा—वह केवल आत्म-विनाश है।
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