लंका काण्ड दोहा (31)

 लंका काण्ड दोहा 31 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ।

तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ।।30।।

भावार्थ

अंगद रावण को ललकारते हुए कहता है—मैं तुम्हें धरती पर पटक दूँगा, तुम्हारी पूरी सेना का नाश कर दूँगा और तुम्हारी नगरी को उजाड़ दूँगा। हे मूर्ख! तुम्हारी स्त्रियों सहित जनकनंदिनी सीता को बलपूर्वक ले जाकर राम के पास पहुँचा दूँगा।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा लंका काण्ड में अंगद द्वारा रावण को दी गई कठोर चेतावनी का प्रतीक है। अंगद यहाँ अपने बल, आत्मविश्वास और राम-भक्ति का परिचय देते हुए रावण के अहंकार को चुनौती देता है। “तोहि पटकि महि” कहकर वह यह स्पष्ट करता है कि रावण का शारीरिक बल और उसका घमंड रामभक्तों के सामने कुछ भी नहीं है। “सेन हति चौपट” से यह संकेत मिलता है कि रावण की विशाल सेना भी राम की शक्ति और नीति के आगे टिक नहीं सकती।

“तव गाउँ” को उजाड़ने की बात रावण की समृद्ध और अभिमानपूर्ण लंका के विनाश का पूर्व संकेत है। अंतिम पंक्ति में “जनकसुतहि लै जाउँ” कहकर अंगद सीता के उद्धार का दृढ़ संकल्प व्यक्त करता है, जिससे स्पष्ट होता है कि सीता का अपहरण अधर्म है और उसका परिणाम रावण के लिए विनाशकारी होगा।

इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी यह संदेश देते हैं कि अहंकार, अधर्म और नारी-असम्मान का अंत निश्चित है। राम की मर्यादा, धर्म और भक्तों की शक्ति के सामने रावण जैसा प्रतापी भी टिक नहीं सकता। यह दोहा लंका के विनाश और रावण के पतन की भूमिका तैयार करता है।

Comments

Popular posts from this blog

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

लंका काण्ड चौपाई (229-236)

लंका काण्ड दोहा (27)