लंका काण्ड दोहा (32)

 लंका काण्ड दोहा 32 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।

सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।।

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।

खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।

 भावार्थ :

अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास

→ रावण कहता है कि दशरथ ने श्रीराम को निर्गुण और तुच्छ समझकर उन्हें वनवास दे दिया।

सो दुख अरु जुबती बिरह…

→  राम को वह दुख और पत्नी-वियोग सहना पड़ा और रावण का दिन-रात भय बना रहा।

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि…

→ जिन मनुष्यों (राम-लक्ष्मण-वानर) के बल पर तुम गर्व कर रहे हो, ऐसे मनुष्य तो राक्षस दिन-रात खाते हैं।

सार:

इस दोहे में रावण का अहंकार और अज्ञान दिखाया गया है—वह दशरथ के निर्णय को भी गलत समझता है और श्रीराम को साधारण मनुष्य मानकर उनका अपमान करता है। यही उसका विनाशकारी भ्रम है।

विशेष:

तुलसीदास जी इस दोहे के माध्यम से यह शिक्षा देते हैं कि अहंकार और बल का घमंड अंततः विनाश का कारण बनता है। रावण अपनी शक्ति के नशे में सत्य को नकार रहा है और इसी कारण विनाश की ओर बढ़ रहा है। दूसरी ओर, श्रीराम की शक्ति धर्म और मर्यादा पर आधारित है, जो अंततः विजय दिलाती है।

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