लंका काण्ड दोहा (33)

 लंका काण्ड दोहा 33 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।

कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।।

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।

धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ।।32(ख)।।

भावार्थ

पवनपुत्र हनुमान उछलकर आए और उस मुकुट को जिसे अंगद ने फेका था, पकड़कर प्रभु राम के पास ले आए। उस दृश्य को भालू और वानर बड़े कौतुक से देखते हैं; हनुमान सूर्य के समान तेजस्वी दिखाई पड़ते हैं।

उधर क्रोधित रावण सभा में सबको आदेश देता है— “इस कपि को पकड़ो और मार डालो।” यह सुनकर अंगद मुस्करा उठते हैं।

विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग लंका की सभा में राम-दूत (हनुमान) के पराक्रम और रावण के अहंकार को उजागर करता है।

1) हनुमान का शौर्य और तेज

हनुमान पवनपुत्र हैं—अतुल बल, वेग और बुद्धि के प्रतीक। “तरकि” (उछलकर) आना उनके अद्भुत वेग को दर्शाता है। शत्रु के बीच निर्भीक होकर दूत को पकड़ लाना उनके आत्मविश्वास और प्रभु-कार्य के प्रति निष्ठा का प्रमाण है। कवि ने उनके तेज को “दिनकर सरिस” कहा—अर्थात् सूर्य के समान प्रकाशमान, जिससे वानर-भालू अचंभित होकर यह कौतुक देखते हैं।

2) रावण का क्रोध और अहंकार

दसानन (रावण) को दूत की निर्भीकता और सभा में अपमान असह्य होता है। वह विवेक छोड़कर क्रोध में आदेश देता है—“पकड़ो और मारो।” यह उसका अहंकार और अधीरता दिखाता है, जो आगे उसके विनाश का कारण बनती है।

3) अंगद की मुस्कान—आत्मविश्वास का संकेत

रावण के घमंडी आदेश पर अंगद का मुस्कराना बहुत अर्थपूर्ण है। यह मुस्कान बताती है कि राम-पक्ष अपने बल पर पूर्णतः आश्वस्त है। उन्हें रावण की धमकियाँ खोखली लगती हैं, क्योंकि सत्य और धर्म की शक्ति उनके साथ है।

4) संदेश

यह दोहा सिखाता है कि धर्म-पक्ष में साहस और तेज होता है, जबकि अधर्म-पक्ष क्रोध और अहंकार में डूबा रहता है। हनुमान का पराक्रम और अंगद का निडर आत्मविश्वास रावण के पतन की भूमिका रचते हैं।

निष्कर्ष:

यह प्रसंग राम-दूत की निर्भीकता, वानर-सेना के उत्साह और रावण के अहंकारी क्रोध—तीनों का सजीव चित्रण करता है, जो लंका-विजय की प्रस्तावना बनता है।

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