लंका काण्ड दोहा (34)

 लंका काण्ड दोहा 34 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सो0-सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।

बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।।33(क)।।

तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर।

तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।33(ख)।।

भावार्थ एवं विस्तृत विवेचन :

🔹 सोरठा (33 क)

पंक्तियाँ:

सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।

बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।।

भावार्थ:

अंगद रावण से कहता है 

जिस राम ने एक ही बाण से बलशाली बालि का वध कर दिया, उस वीर पुरुष (राम) को तुम क्यों साधारण मनुष्य समझ रहे हो?

हे रावण! तेरी बीस आँखें होते हुए भी तू अंधा है। तेरी बुद्धि जड़ है और तेरा जन्म ही धिक्कार योग्य है।

विवेचन:

यहाँ अंगद रावण की मूर्खता और अहंकार पर कटाक्ष कर रहे हैं। जो राम बालि जैसे महावीर को मार सकते हैं, उनसे टकराना रावण की अज्ञानता है। उसकी शक्ति और आँखें होने पर भी विवेक नहीं है।

🔹 दोहा (33 ख)

पंक्तियाँ:

तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर।

तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।

भावार्थ:

अब राम के बाण रक्त की प्यास से तृषित हैं।

हे अधम राक्षस! तेरे कटु वचनों से मैं तुझे छोड़ नहीं सकता।

विवेचन:

अंगद रावण को चेतावनी दे रहा है कि राम अब युद्ध के लिए तत्पर हैं। उनके बाण राक्षसों के रक्त के लिए व्याकुल हैं। रावण के अपमानजनक शब्दों ने उसके विनाश को निश्चित कर दिया है।

🔹 सार

इन पंक्तियों में रावण के अहंकार, मूर्खता और विनाश की ओर बढ़ते कदमों का वर्णन है। राम की शक्ति का स्मरण कराते हुए उसे चेतावनी दी गई है, फिर भी वह नहीं मानता — यही उसके पतन का कारण बनता है।

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