लंकाकांड चौपाई (355-365)

 लंकाकांड  चौपाई (355-365) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।।

लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा।।

तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन।।

करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा।।

जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे।।

प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए।।

हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं।।

गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा।।

जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका।।

घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी।।

भावार्थ

जब रामचंद्र जी को शत्रु (रावण) की ओर से समाचार मिला, तब उन्होंने अपने सभी प्रमुख मंत्रियों को पास बुलाया और कहा—

लंका के चारों ओर चार भयानक द्वार हैं, उन्हें किस प्रकार जीता जाए—इस पर विचार करो।

तब सुग्रीव, जामवंत और विभीषण ने मन में सूर्यवंश के भूषण श्रीराम का स्मरण किया और गहन विचार करके यह निश्चय किया कि

वानर सेना को चार भागों में बाँटकर चारों द्वारों पर आक्रमण किया जाए।

योग्यता के अनुसार सेनापति नियुक्त किए गए और सभी योद्धाओं को उनके-उनके दल सौंपे गए।

श्रीराम ने अपने प्रताप का स्मरण कराते हुए सबको समझाया।

यह सुनकर वानर वीर सिंहनाद (जोर से गर्जना) करते हुए युद्ध के लिए दौड़ पड़े।

वे आनंदपूर्वक श्रीराम के चरणों में शीश नवाकर पर्वतों की चोटियाँ पकड़कर छलाँगें लगाने लगे।

भालू और वानर वीर गर्जना और ललकार करते हुए पुकारने लगे—

“जय श्रीराम! जय रघुवीर! जय कोसलाधीश!”

लंका अत्यंत दुर्गम और सुरक्षित थी, यह जानते हुए भी प्रभु श्रीराम के प्रताप पर भरोसा कर वानर सेना निडर होकर आगे बढ़ी।

चारों दिशाओं से लंका को घेर लिया गया और युद्ध के नगाड़े तथा भेरियाँ बजने लगीं।

🔹 विस्तृत विवेचन

राम की नीति और संगठन शक्ति

यहाँ श्रीराम केवल योद्धा नहीं, बल्कि कुशल सेनानायक के रूप में दिखाई देते हैं। वे बिना योजना युद्ध नहीं करते।

मंत्रणा में सुग्रीव–जामवंत–विभीषण की भूमिका

ये तीनों अनुभव, बल और नीति के प्रतीक हैं। विशेष रूप से विभीषण लंका की कमजोरी जानते हैं।

चार अनी (सेना-विभाग)

चार दिशाओं से आक्रमण करना यह दर्शाता है कि अधर्म को चारों ओर से घेरकर समाप्त किया जाता है।

राम-भक्ति से उत्पन्न निर्भयता

लंका के दुर्गम होने पर भी वानर निर्भय हैं, क्योंकि उनके साथ राम का प्रताप है।

जयघोष और नाद

यह केवल युद्ध का आरंभ नहीं, बल्कि यह संकेत है कि

👉 धर्म की सेना का उत्साह अधर्म को पहले ही पराजित कर देता है।

✨ संदेश

जहाँ राम का प्रताप हो, वहाँ असंभव भी संभव हो जाता है।

संगठन, नीति और भक्ति—तीनों मिलकर विजय दिलाते हैं।



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