लंका काण्ड दोहा (35)

 लंका काण्ड दोहा 35 का भावार्थ सहित विस्तृत 

विवेचन:

दो0-कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।

झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।।34(क)।।

भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।।

कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग।।34(ख)।।

भावार्थ

(34 क)

मेघनाद जैसे करोड़ों पराक्रमी योद्धा उत्साह से उठकर अंगद पर झपटते हैं, परन्तु वे कपिराज अंगद के चरणों को हिला नहीं पाते। अंततः हार मानकर उनके चरणों में सिर झुका देते हैं।

(34 ख)

अंगद अपने चरण भूमि से नहीं हटाते। शत्रुओं का घमंड टूटता हुआ देखकर वे अडिग रहते हैं। जैसे सच्चा संत असंख्य विघ्नों के बीच भी नीति (धर्म-पथ) नहीं छोड़ता, वैसे ही अंगद भी अचल रहते हैं।

विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग अंगद के अचल पराक्रम और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है। रावण की सभा में अंगद ने चुनौती दी कि जो उनके चरण को हिला दे, वही सीता को ले जाए। इससे लंका के वीरों का अहंकार जाग उठा।

राक्षसी शक्ति का परीक्षण

मेघनाद जैसे असाधारण योद्धा और उनके समान असंख्य वीर पूरे वेग से झपटते हैं, पर अंगद के चरण टस से मस नहीं होते। यहाँ तुलसीदास जी दिखाते हैं कि धर्मबल, बाहुबल से श्रेष्ठ है।

अहंकार का भंग

शत्रु-वीरों का मद चूर होता है। वे अंततः अंगद के चरणों में सिर नवाते हैं—यह पराजय केवल शारीरिक नहीं, अहंकार की पराजय है।

संत-उपमा का संकेत

“कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग”—जैसे सच्चा संत विपत्तियों में भी नीति नहीं छोड़ता, वैसे ही अंगद भी अडिग रहते हैं। यह उपमा बताती है कि अंगद का बल मर्यादा-पुरुषोत्तम राम की नीति से पोषित है।

राजदूत की मर्यादा

अंगद का अचल रहना केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं, बल्कि दूत-धर्म की प्रतिष्ठा है—रावण को चेतावनी और राम-बल का प्रत्यक्ष प्रमाण।

निष्कर्ष:

इन दोहों में अंगद का अडिग पराक्रम, शत्रु-गर्व का भंग और संत-सदृश नैतिक दृढ़ता—तीनों एक साथ उजागर होते हैं। यह संदेश मिलता है कि धर्मयुक्त साहस के आगे अहंकार टिक नहीं पाता।

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