लंकाकांड चौपाई (366-375)
लंकाकांड चौपाई (366-375) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी।।
देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई।।
आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे।।
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा।।
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू।।
उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना।।
चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी।।
तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सुल कृपान परिघ गिरिखंडा।।
जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी।।
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा।।
भावार्थ:
लंका में भारी कोलाहल मच गया। अत्यन्त अहंकारी रावण ने यह समाचार सुना और बोला—“देखो, वानरों की कैसी ढिठाई है!” यह कहकर उसने हँसते हुए राक्षसों की सेना बुला ली। रावण ने कहा कि ये वानर मानो काल के प्रेरित होकर आए हैं और भूखे होकर मेरे राक्षसों का आहार बनने वाले हैं। इतना कहकर वह दुष्ट अट्टहास करने लगा और घर बैठा भोजन करने लगा। फिर उसने वीर राक्षसों को चारों दिशाओं में जाने की आज्ञा दी कि जहाँ भी भालू और वानर मिलें, पकड़-पकड़ कर खा जाओ।
शिव जी कहते हैं—हे उमा! रावण का यह अभिमान वैसा ही था जैसे टिट्टिभ पक्षी का अपने छोटे-से सामर्थ्य पर आकाश को चुनौती देना। आज्ञा पाकर राक्षस भाले, भिंडिपाल, तोमर, मुगदर, परशु, कृपाण, परिघ आदि प्रचण्ड हथियार लेकर चल पड़े। जैसे मांसाहारी मूर्ख पक्षी ओलों को देखकर उन्हें मांस समझकर टूट पड़ते हैं और चोंच टूटने पर भी उन्हें समझ नहीं आती, वैसे ही ये मूढ़ राक्षस प्रभु राम के दूतों पर टूट पड़े—परिणाम समझे बिना।
विस्तृत विवेचन:
यह चौपाई रावण के अहंकार, अविवेक और आसन्न विनाश का सशक्त चित्रण करती है।
रावण का अहंकार और अंधत्व:
हनुमान के पराक्रम से लंका में कोलाहल मचा, फिर भी रावण सत्य को स्वीकार नहीं करता। वह वानरों को तुच्छ समझकर हँसी उड़ाता है। उसका “गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा” कहना बताता है कि वह संकट को खेल समझ रहा है—यही अहंकार पतन का कारण बनता है।
अविवेकपूर्ण आदेश:
रावण का यह कहना कि “धरि धरि भालु कीस सब खाहू” उसकी क्रूरता ही नहीं, मूर्खता भी दिखाता है। वह यह नहीं समझ पा रहा कि ये सामान्य जीव नहीं, श्रीराम के दूत और देवकार्य में संलग्न वीर हैं।
टिट्टिभ का दृष्टांत:
शिव जी का दृष्टांत अत्यन्त अर्थपूर्ण है। जैसे टिट्टिभ पक्षी समुद्र या आकाश से उलझकर स्वयं को महान समझता है, वैसे ही रावण भी प्रभु राम से टकराने का दम्भ करता है—परिणामस्वरूप उसका नाश निश्चित होता है।
मूर्खता का रूपक (ओलों का उदाहरण):
मांसाहारी पक्षी ओलों को मांस समझकर चोंच तोड़ लेते हैं, फिर भी नहीं समझते। यह रूपक राक्षसों की स्थिति बताता है—वे बार-बार पराजित होकर भी सत्य नहीं पहचानते। यह अज्ञान से उपजे अहंकार का चरम रूप है।
निष्कर्ष:
यह चौपाई सिखाती है कि अहंकार बुद्धि को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति या सत्ता सत्य, विवेक और धर्म से विमुख होकर शक्ति के मद में रहती है, उसका पतन अवश्यंभावी होता है—जैसे रावण और उसकी सेना का।
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