लंकाकांड दोहा (39)

 लंका काण्ड दोहा 39 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।

तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस।।38(((क)।।

परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।

समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार।।38(ख)।।

भावार्थ

धर्महीन, प्रभु श्रीराम के चरणों से विमुख और काल के वश में पड़ा रावण विनाश की ओर बढ़ रहा है।

उसका त्याग कर, जो सद्गुणों से युक्त हैं, वे ही कल्याण को प्राप्त होते हैं—हे कोसलाधीश! यह सत्य है।

अंगद की परम चतुरता और तर्कपूर्ण वाणी सुनकर उदार श्रीराम मुस्कराए और फिर लंका के पूरे समाचार उनसे सुनने लगे।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा अंगद के विवेकपूर्ण वचन और श्रीराम की उदारता को उजागर करता है।

रावण का पतन कारण

रावण धर्महीन हो चुका है और प्रभु-विमुख है।

काल के वश में पड़ने से उसका विनाश निश्चित है।

तुलसीदास जी का सिद्धांत—धर्म से विमुख व्यक्ति चाहे कितना शक्तिशाली हो, अंततः नष्ट होता है।

सद्गुणों का महत्त्व

जो व्यक्ति अधर्म, अहंकार और दुराचार का त्याग कर सद्गुण अपनाता है, वही उन्नति करता है।

यह सार्वकालिक नीति-संदेश है।

अंगद की चतुराई

अंगद ने सभा में निडर होकर, नीति और तर्क से बात रखी।

उनका उद्देश्य युद्ध नहीं, धर्म की स्थापना और रावण को अंतिम अवसर देना था।

श्रीराम की उदारता

राम अंगद की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर मुस्कराते हैं।

वे धैर्यपूर्वक पूरा समाचार सुनते हैं—यह मर्यादा, करुणा और नेतृत्व का आदर्श है।

निष्कर्ष:

यह दोहा सिखाता है कि अधर्म का अंत और धर्म की विजय निश्चित है, तथा सच्चा नेतृत्व विवेक, धैर्य और उदारता से पहचाना जाता है।


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