लंकाकांड दोहा (40)
लंकाकांड दोहा 40 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव।
गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव।।39।।
भावार्थ
राम, लक्ष्मण, कपीराज सुग्रीव की जय-जयकार हो रही है। वानर और भालु अपनी अपार शक्ति के साथ सिंहनाद करते हुए युद्ध के लिए गर्जना कर रहे हैं। चारों ओर उत्साह, पराक्रम और विजय का वातावरण है।
विस्तृत विवेचन
इस दोहे में लंका-युद्ध से ठीक पहले की विजयोन्मुख स्थिति का चित्रण है। राम-लक्ष्मण की उपस्थिति धर्म और सत्य की विजय का संकेत देती है, जबकि कपीराज सुग्रीव के नाम के साथ वानर-भालु सेना का सिंहनाद सामूहिक साहस और अनुशासन को प्रकट करता है।
“जयति राम जय लछिमन”— यह केवल नारा नहीं, बल्कि ईश्वरीय नेतृत्व में धर्मयुद्ध की घोषणा है। राम करुणा और मर्यादा के, लक्ष्मण त्याग और पराक्रम के प्रतीक हैं।
“जय कपीस सुग्रीव”— सुग्रीव का उल्लेख बताता है कि युद्ध में केवल दैवी नहीं, संगठित मानवीय/वानरी शक्ति भी सक्रिय है।
“गर्जहिं सिंघनाद”— सिंहनाद शत्रु के हृदय में भय और अपनी सेना में आत्मविश्वास भर देता है।
“कपि भालु महा बल सींव”— वानर-भालु सेना की असाधारण शक्ति और एकता रावण के अहंकार को चुनौती देती है।
कुल मिलाकर, यह दोहा धर्म की सेना की मानसिक और सामरिक तैयारी, उत्साह और विजय-विश्वास का सजीव चित्र खींचता है। यहाँ जयघोष स्वयं एक शस्त्र बन जाता है—जो पहले मनोबल जीतता है, फिर रणभूमि।
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