लंकाकांड दोहा (41)

 लंकाकांड दोहा 41 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।

कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर।।40।।

भावार्थ

अनेक प्रकार के शस्त्र, बाण और धनुष धारण किए हुए बलशाली राक्षस वीर लंका के किले की प्राचीरों और बुर्जों पर चढ़ गए। वे सब असंख्य युद्धवीर रण के लिए तैयार हो गए।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा लंका में युद्ध की तीव्र तैयारी और राक्षसों की उग्र मानसिकता को प्रकट करता है। श्रीराम की सेना के आगमन से लंका में भय और हलचल फैल चुकी है। इसी कारण रावण की आज्ञा से समस्त राक्षस योद्धा सज्ज हो जाते हैं।

1. नानायुध सर चाप धर

यहाँ ‘नानायुध’ शब्द राक्षसों की विशाल सैन्य शक्ति और युद्ध-सज्जा को दर्शाता है। वे केवल धनुष-बाण ही नहीं, बल्कि भाले, तलवार, गदा आदि अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर तैयार हैं। इससे युद्ध की भयंकरता का संकेत मिलता है।

2. जातुधान बल बीर

‘जातुधान’ राक्षसों के लिए प्रयुक्त शब्द है। तुलसीदास जी बताते हैं कि ये राक्षस केवल संख्या में ही नहीं, बल्कि बल और पराक्रम में भी प्रवीण हैं। वे स्वयं को अजेय मानते हैं।

3. कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए

राक्षस किले की ऊँची प्राचीरों और बुर्जों पर चढ़ जाते हैं। यह उनकी रक्षात्मक तैयारी के साथ-साथ अहंकार को भी दर्शाता है—उन्हें लगता है कि ऊँचे किले से वे शत्रु को सरलता से परास्त कर देंगे।

4. कोटि कोटि रनधीर

‘कोटि-कोटि’ का प्रयोग अतिशयोक्ति अलंकार है, जो राक्षसों की विशाल संख्या और युद्ध के लिए उनकी तत्परता को प्रकट करता है। रणधीर अर्थात युद्ध में धैर्य और साहस रखने वाले योद्धा।

शिक्षा / संकेत

यह दोहा बताता है कि अहंकार और बाहरी शक्ति का प्रदर्शन रावण पक्ष की विशेषता है, जबकि राम पक्ष में धर्म, मर्यादा और आत्मबल प्रमुख हैं। आगे चलकर यही अहंकार रावण के पतन का कारण बनता है।


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