लंकाकांड दोहा (42)

 लंकाकांड दोहा 42 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।

ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ।।41।।

भावार्थ

वानर वीर एक-एक राक्षस को पकड़कर ऊपर उछाल देते हैं और स्वयं नीचे हट जाते हैं। राक्षस ऊपर से गिरते हुए धरती पर आकर मारे जाते हैं।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा लंका युद्ध के आरंभिक भीषण संघर्ष का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है।

वानर सेना की युद्ध-कौशल

कपि केवल बल से नहीं, बल्कि रणनीति से युद्ध कर रहे हैं। वे राक्षसों को पकड़कर आकाश में उछाल देते हैं, जिससे उनका संतुलन टूट जाता है।

राक्षसों की पराजय

ऊपर से गिरते हुए राक्षसों को संभलने का अवसर नहीं मिलता और वे धरती पर गिरकर मारे जाते हैं। इससे उनकी शारीरिक शक्ति निष्फल हो जाती है।

कपियों का अद्भुत पराक्रम

यहाँ कपियों की फुर्ती, बल और निर्भीकता स्पष्ट होती है। वे बिना अस्त्र-शस्त्र के भी राक्षसों को परास्त कर रहे हैं।

अधर्म पर धर्म की विजय का संकेत

राक्षसों का ऊपर से गिरना यह दर्शाता है कि अहंकार ऊँचाई से गिरता है, और अधर्म अंततः धराशायी होता है।

सार

यह दोहा वानर सेना की अपार शक्ति, बुद्धि और धर्मबल को दर्शाता है तथा यह सिद्ध करता है कि राम के पक्ष में प्रकृति और पराक्रम दोनों हैं।


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