लंकाकांड दोहा (43)

 लंकाकांड दोहा 43 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।

ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी।।42।।

भावार्थ

राक्षसों के वीर योद्धा अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करके आमने-सामने डटकर युद्ध करने लगे। वे परिघ (लोहे के भारी दंड) और त्रिशूल से वार कर भालुओं और वानरों को व्याकुल कर रहे थे।

विस्तृत विवेचन

लंका युद्ध अपने चरम पर पहुँच चुका है। इस दोहे में तुलसीदास जी राक्षसों की युद्ध-तत्परता और उनके आक्रामक शस्त्रों का सजीव चित्रण करते हैं। “बहु आयुध धर” से स्पष्ट होता है कि राक्षस पूरी तैयारी और अहंकार के साथ रणभूमि में उतरे हैं। “भिरहिं पचारि पचारि” आमने-सामने की घमासान मुठभेड़ को दर्शाता है—यह युद्ध छल से नहीं, बल्कि सीधे बल-पराक्रम से लड़ा जा रहा है।

राक्षस परिघ और त्रिशूल जैसे भारी व घातक अस्त्रों से प्रहार कर रहे हैं, जिससे वानर-भालु सेना कुछ समय के लिए व्याकुल हो जाती है। यहाँ “ब्याकुल” शब्द अस्थायी पीड़ा और हलचल का संकेत है, न कि पराजय का। तुलसीदास जी संकेत देते हैं कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, राम-दल की आस्था और वीरता अडिग है। आगे चलकर यही सेना राक्षसों के घमंड को चूर-चूर कर देती है।

यह दोहा यह भी सिखाता है कि अधर्म का बाहरी बल चाहे कितना ही प्रबल क्यों न हो, वह धर्मनिष्ठ शक्ति के सामने टिक नहीं सकता। युद्ध का यह दृश्य भक्ति-काव्य में वीर-रस को उभारते हुए प्रभु राम की विजय की भूमिका तैयार करता है।


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