लंकाकांड दोहा (44)

 लंकाकांड दोहा 44 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।

रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल।।43।।

भावार्थ

जब अंगद ने सुना कि पवनपुत्र हनुमान अकेले ही लंका के किले पर चढ़ गए हैं, तब युद्ध में अत्यंत निपुण, वीर और पराक्रमी बालि-पुत्र अंगद भी यह सुनकर पीछे नहीं रहे। वे कूदकर, खेल-खेल में ही (अत्यंत सहज भाव से) किले पर चढ़ गए।

विस्तृत विवेचन

यह दोहा वानर सेना के अदम्य साहस, परस्पर प्रेरणा और युद्ध-उत्साह को उजागर करता है।

हनुमान का उदाहरण (प्रेरक नेतृत्व)

पवनसुत हनुमान का अकेले किले पर चढ़ जाना केवल शौर्य नहीं, बल्कि नेतृत्व का आदर्श है। उनका कार्य देखकर अन्य वीरों में भी उत्साह जाग उठता है। हनुमान का साहस संक्रामक है—वह दूसरों को भी वीरता के लिए प्रेरित करता है।

अंगद का स्वभाव (रणकौशल और आत्मविश्वास)

अंगद को ‘रण बाँकुरा’ कहा गया है—अर्थात युद्ध-कला में कुशल, निडर और तेजस्वी। वे बालि के पुत्र हैं; अतः उनमें स्वाभाविक वीरता और गर्व है। हनुमान की तरह ही वे भी जोखिम लेने से नहीं हिचकते।

‘तरकि चढ़ेउ कपि खेल’ का भाव

यहाँ ‘खेल’ शब्द विशेष अर्थ रखता है। किले पर चढ़ना साधारण कार्य नहीं, पर अंगद के लिए यह खेल समान है—यह उनके अतुल बल, अभ्यास और निर्भयता को दर्शाता है। युद्ध उनके लिए बोझ नहीं, धर्म-कार्य का आनंद है।

सामूहिक मनोबल का संकेत

यह दोहा दिखाता है कि वानर सेना व्यक्तिगत पराक्रम से आगे बढ़कर सामूहिक उत्साह में बदल रही है। एक वीर की कार्रवाई पूरी सेना के मनोबल को ऊँचा कर देती है—यही रामकाज की शक्ति है।

सार

इस दोहे में तुलसीदास जी ने बताया है कि सच्चा साहस दूसरों में भी साहस जगा देता है। हनुमान का एकाकी पराक्रम अंगद जैसे महावीर को भी तत्क्षण कर्म-पथ पर ले आता है। यही रामायण का संदेश है—धर्म के लिए उठाया गया एक कदम अनेक वीरों को आगे बढ़ा देता है।


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