लंकाकांड चौपाई (410- 417)

 लंकाकांड चौपाई 410-417 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।।

कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा।।

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।।

उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर।।

देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी।।

अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी।।

अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा।।

लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें।।

भावार्थ:

जो-जो महाबली और प्रमुख राक्षस मारे गए, उन्प्रहें हनुमान और अंगद पैर पकड़कर प्रभु श्रीराम के पास भेज देते थे।विभीषण उनके नाम बताते हैं और प्रभु श्रीराम उन्हें भी अपने परम धाम में स्थान देते हैं। जो दुष्ट, मनुष्य, देवता या ब्राह्मण—जो भी पापमय भोगों में लिप्त थे—यदि वे भी प्रभु से शरण माँगते हैं, तो वही गति पाते हैं जिसे योगी कठिन तप से खोजते हैं।

भगवती उमा से तुलसीदास कहते हैं—राम करुणासागर हैं; वैरभाव से भी उनका स्मरण करने वाले राक्षसों को वे परम गति देते हैं। ऐसे कृपालु प्रभु की कृपा का वर्णन कौन कर सकता है? फिर भी जो ऐसे प्रभु को सुनकर भी भ्रम त्यागकर भजन नहीं करते, वे बुद्धिहीन और परम अभागे हैं।

उधर अंगद और हनुमान दुर्ग में प्रवेश करते हैं। लंका में वे दोनों ऐसे शोभित होते हैं मानो समुद्र को मथने वाले दो मंदराचल पर्वत हों।

विस्तृत विवेचन:

इन चौपाइयों में श्रीराम की अनन्य करुणा और शरणागत-वत्सलता का महात्म्य प्रकट होता है। तुलसीदास स्पष्ट करते हैं कि प्रभु के लिए पात्रता का माप पूर्व कर्म नहीं, वर्तमान शरण है। वैरभाव से भी जिनका स्मरण हुआ—अर्थात जिनका चित्त प्रभु में लगा—उन्हें भी प्रभु ने परम गति दी। यह भक्ति-तत्त्व का चरम उदार रूप है, जहाँ प्रभु भाव देखते हैं, भूतकाल नहीं।

विभीषण का नामोल्लेख न्याय और धर्म की साक्षी है—वह दर्शाता है कि प्रभु का राज्य धर्म-आधारित है। उमा-संवाद से तुलसीदास यह भी कहते हैं कि ऐसे करुणामय प्रभु को जानकर भी जो भजन नहीं करता, वह स्वयं अपने सौभाग्य का नाश करता है।

अंत में अंगद और हनुमान का लंका में प्रवेश शक्ति, धैर्य और विजय-प्रतीक के रूप में चित्रित है। “दो मंदराचल” की उपमा से उनकी महाबलता और लंका पर पड़े प्रभाव का सजीव बिंब बनता है—जैसे समुद्र-मंथन में पर्वत सब कुछ उलट-पुलट कर दे।

निष्कर्ष:

यह प्रसंग सिखाता है कि श्रीराम की कृपा सीमाहीन है; शरणागत के लिए द्वार सदा खुले हैं। भक्ति का सार—भ्रम त्याग, शरणागति और स्मरण—यही परम कल्याण का मार्ग है।


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