लंकाकांड चौपाई (418-428)

 लंकाकांड चौपाई (418-428) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।।

राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे।।

गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना।।

जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई।।

निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।।

द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।।

महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे।।

सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा।।

प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे।।

अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया।।

भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा।।

भावार्थ :

वीर योद्धाओं ने प्रभु श्रीराम के चरणकमलों पर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उन्हें देखकर रघुनाथ का मन प्रसन्न हो गया। श्रीराम ने कृपा करके दोनों वीरों को स्नेह से देखा, जिससे उनका सारा श्रम दूर हो गया और उन्हें परम सुख मिला। यह जानकर अंगद और हनुमान लौट आए और भालू-वानर सेना के अनेक योद्धा भी पीछे हटे।

उधर राक्षसों को संध्या का बल मिला तो वे रावण की जय-जयकार करते हुए टूट पड़े। राक्षस सेना को देखकर वानर भी जगह-जगह भिड़ गए। दोनों प्रबल दल एक-दूसरे को ललकारते हुए ऐसे लड़े कि कोई हार मानने को तैयार नहीं था। अनेक रंगों और रूपों वाले बलवान वानर और महावीर राक्षस युद्ध में कूद पड़े। दोनों ओर की सेनाएँ समान बल वाली थीं, क्रोध में कौतुक करते हुए युद्ध कर रही थीं। ऐसा लगता था मानो घने बादल छा गए हों और पवन के वेग से युद्ध चल रहा हो। इंद्रजीत, अकम्पन और अतिकाय ने मायावी शक्ति से सेना को विचलित कर दिया। एक क्षण में घोर अँधकार छा गया और रक्त, पत्थर तथा राख की वर्षा होने लगी।

विस्तृत विवेचन

यह चौपाई लंकाकांड के उस प्रसंग को दर्शाती है जहाँ श्रीराम की करुणा और सेनाओं के भीषण संग्राम—दोनों का सजीव चित्रण है। पहले भाग में रामकृपा का प्रभाव दिखाया गया है: प्रभु के दर्शन मात्र से वीरों का श्रम मिट जाता है। यह बताता है कि ईश्वर की अनुकम्पा से मानसिक-शारीरिक कष्ट सहज ही समाप्त हो जाते हैं।

दूसरे भाग में युद्ध का रौद्र रूप उभरता है। संध्या के समय राक्षसों को मिलने वाले बल का उल्लेख तामसिक शक्ति के प्रतीक के रूप में है। दोनों सेनाओं का समान बल, ललकार, क्रोध और कौतुक—युद्ध की तीव्रता को बढ़ाते हैं। कवि ने मेघ, पवन और अंधकार के रूपक से रणभूमि की भयावहता रची है।

इंद्रजीत, अकम्पन और अतिकाय की माया से क्षणभर में अंधकार और रक्तवृष्टि का दृश्य यह दिखाता है कि अधर्म छल-कपट का सहारा लेता है, पर अंततः वह स्थायी नहीं होता। इस चौपाई में तुलसीदास जी ने एक ओर रामकृपा की शांति और दूसरी ओर युद्ध की उग्रता—दोनों को संतुलित रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे धर्म और अधर्म के संघर्ष का गूढ़ अर्थ स्पष्ट होता है।

Comments

Popular posts from this blog

लंकाकांड चौपाई (376-383)

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

लंकाकांड चौपाई (495--502)