लंकाकांड चौपाई (429-436)

 लंकाकांड चौपाई (429-436) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।।

समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए।।

पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।।

भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।।

भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा।।

हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।

भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी।।

गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं।।

भावार्थ:

श्रीराम ने समस्त परिस्थिति का रहस्य भली-भाँति समझ लिया। उन्होंने अंगद और हनुमान को बुलाकर सब समाचार सुने और समझे। यह सुनते ही वानर-सेना में उत्साह भर गया और वे आगे बढ़े। तब कृपालु श्रीराम मुस्कराए, धनुष चढ़ाया और अग्निबाण छोड़ दिया। उसके प्रकाश से अंधकार पूरी तरह मिट गया—जैसे ज्ञान के उदय से संदेह नष्ट हो जाता है। प्रकाश पाकर भालू-वानर हर्षित हो गए, उनका श्रम और भय दूर हो गया। हनुमान और अंगद युद्धघोष करने लगे; उनकी गर्जना सुनकर राक्षस भाग खड़े हुए। भागते हुए राक्षस धरती पर गिराए जाते, वानर-भालू अद्भुत पराक्रम दिखाते। वे शत्रुओं को पकड़कर समुद्र में फेंक देते, जहाँ मगर, सर्प और मछलियाँ उन्हें खा जातीं।

विस्तृत विवेचन:

श्रीराम का सर्वज्ञ नेतृत्व: “सकल मरमु रघुनायक जाना”—यह पंक्ति श्रीराम की दूरदर्शिता और करुणामय नेतृत्व को दर्शाती है। वे केवल बल से नहीं, विवेक से निर्णय लेते हैं।

अग्निबाण का प्रतीकात्मक अर्थ: अग्निबाण से अंधकार का नाश केवल भौतिक नहीं, आध्यात्मिक भी है—यह अज्ञान के विनाश और ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है। “ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं” इसी सत्य को स्पष्ट करता है।

सेना में नवचेतना: प्रकाश पाते ही वानर-भालू का भय और थकान मिटना दिखाता है कि धर्म और सत्य के साथ होने पर मनोबल स्वतः बढ़ता है।

हनुमान-अंगद का पराक्रम: उनकी गर्जना धर्मपक्ष की निर्भीकता है, जिससे अधर्म भयभीत होकर भागता है।

अधर्म का अंत: राक्षसों का समुद्र में फेंका जाना यह बताता है कि अधर्म अंततः स्वयं ही नष्ट होता है।

सार:

यह चौपाई बताती है कि श्रीराम का ज्ञान-प्रकाश जहाँ फैलता है, वहाँ अंधकार, भय और संदेह का स्थान नहीं रहता; और धर्म की सेना अद्भुत पराक्रम से विजय की ओर बढ़ती है।

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