लंकाकांड चौपाई (445-454)

 लंकाकांड चौपाई (445-454) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।।

ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।।

बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।।

तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना।।

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा।।

कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा।।

सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा।।

करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा।।

कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा।।

बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए।।

भावार्थ :

सचिव माल्यवंत रावण से कहते हैं – “हे रावण बैर छोड़कर सीता जी को लौटा दो और परम कृपालु श्रीराम का भजन करो।”

माल्यवंत के  ये वचन रावण को बाण की तरह चुभते हैं। वह क्रोधित होकर अपशब्द कहता है और कहता है – “तू बूढ़ा हो गया है, नहीं तो मैं तुझे मार डालता। अब मेरे सामने मत आना।”

माल्यवंत समझ जाते हैं कि रावण उन्हें मारना चाहता है, इसलिए वे वहाँ से चले जाते हैं। तब मेघनाद (घननाद) क्रोध में कहता है – “कल प्रातः मेरा पराक्रम देखना, मैं बहुत कुछ करूँगा।” यह सुनकर रावण को अपने पुत्र पर भरोसा हो जाता है और वह प्रेम से उसे गोद में बैठा लेता है।

उधर सुबह होते ही वानर सेना चारों द्वारों से लंका को घेर लेती है। चारों ओर कोलाहल मच जाता है। राक्षस विभिन्न अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़ते हैं और किले से पर्वत-शिखर गिराने लगते हैं।

विस्तृत विवेचन:

यह प्रसंग नीति और अहंकार का टकराव दिखाता है।

माल्यवंत की नीति – वे धर्म, शांति और श्रीराम की शरण का उपदेश देते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चा हितैषी वही है जो कटु सत्य भी कहे।

रावण का अहंकार – सत्य सुनकर भी वह क्रोधित हो जाता है। उसके लिए सत्ता और अभिमान सत्य से बड़े हो जाते हैं।

मेघनाद का गर्व – वह अपने बल पर अत्यधिक विश्वास करता है। यह युवावस्था का उग्र साहस और अहंकार दर्शाता है।

युद्ध का प्रारंभिक दृश्य – वानरों द्वारा लंका घेरना अधर्म के अंत का संकेत है।

मुख्य संदेश:

धर्म का मार्ग अपनाना ही कल्याणकारी है।

अहंकार विनाश का कारण बनता है।

सच्ची भक्ति और नीति अंततः विजय दिलाती है।


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