लंकाकांड दोहा (46)

 लंकाकांड दोहा (46) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।

कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।

भावार्थ

अपने भुजबल से शत्रु-सेना को रौंदकर जब दिन का अंत हो गया, तब वे दोनों वीर वानर (अंगद और हनुमान) बिना किसी थकान के वहाँ आ पहुँचे, जहाँ भगवान श्रीराम विराजमान थे।

विस्तृत विवेचन

इस दोहे में युद्धभूमि से लौटते हुए दो महान कपिवीरों—हनुमान और अंगद—की अद्भुत वीरता और शक्ति का वर्णन है। उन्होंने अपने अपार भुजबल से राक्षसों की पूरी सेना को मसल दिया। दिन भर के घोर युद्ध के बाद भी उनके शरीर में कोई श्रम या थकावट नहीं दिखाई देती। यह इस बात का संकेत है कि वे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत बलवान हैं।

दिन का अंत होते ही वे दोनों छलांग लगाकर भगवान श्रीराम के पास पहुँचते हैं। यह दर्शाता है कि उनका सारा पराक्रम प्रभु की सेवा के लिए है, न कि अहंकार के लिए। युद्ध जीतकर भी वे सीधे अपने स्वामी के चरणों में उपस्थित होते हैं—यही सच्चे भक्त और सेवक की पहचान है।

यह दोहा यह भी सिखाता है कि ईश्वर-कार्य में लगे सेवक को कभी थकान नहीं होती। प्रभु की कृपा से उसके भीतर असीम ऊर्जा बनी रहती है। साथ ही, यह प्रसंग रामभक्तों की एकता, निष्ठा और अदम्य साहस को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।

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