लंकाकांड चौपाई (463-470)

 लंकाकांड चौपाई (463-470) का भावार्थ सहित 

विस्तृत विवेचन:

देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला।।

महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा।।

आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई।।

बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना।।

रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा।।

अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे।।

देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना।।

जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला।।

यह चौपाई रामचरितमानस के लंका कांड से ली गई है। इसमें हनुमान और मेघनाद (इंद्रजीत) के बीच भीषण युद्ध का वर्णन है।

✍️ भावार्थ :

जब पवनसुत हनुमान जी ने देखा कि वानर सेना व्याकुल हो रही है, तो वे ऐसे क्रोधित हुए जैसे स्वयं काल दौड़ पड़ा हो। उन्होंने तुरंत एक बड़ा पर्वत उठा लिया और अत्यंत क्रोध में मेघनाद पर फेंक दिया।

मेघनाद ने पर्वत को आते देख तुरंत आकाश में उड़ान भर ली। उसका रथ, सारथी और घोड़े नष्ट हो गए।

हनुमान जी बार-बार उसे ललकारते रहे, पर मेघनाद उनके पास नहीं आया क्योंकि वह उनका बल और रहस्य जान चुका था।

फिर मेघनाद राम जी के पास गया और तरह-तरह से कटु वचन कहने लगा। उसने अनेक अस्त्र-शस्त्र चलाए, परंतु प्रभु ने खेल-खेल में ही उन्हें काट दिया।

यह देखकर मेघनाद क्रोधित और लज्जित हुआ तथा अनेक प्रकार की माया रचने लगा।

तुलसीदास जी कहते हैं — जैसे कोई व्यक्ति गरुड़ के साथ खेल करे और उसे डराने के लिए छोटा सा साँप पकड़ ले, वैसे ही मेघनाद प्रभु के सामने अपनी माया दिखा रहा था।

🔎 विस्तृत विवेचन

हनुमान जी का वीर रूप –

यहाँ हनुमान जी को ‘काल’ के समान बताया गया है। इसका अर्थ है कि जब धर्म की रक्षा की बात आती है, तो वे विनाशकारी रूप धारण कर लेते हैं।

मेघनाद की कायरता –

वह सामने से युद्ध करने के बजाय आकाश में भाग जाता है। यह उसके भीतर के भय को दर्शाता है।

राम जी की दिव्यता –

प्रभु के लिए मेघनाद के अस्त्र-शस्त्र केवल खेल समान हैं। यह बताता है कि ईश्वर के सामने मायावी शक्ति टिक नहीं सकती।

गरुड़ और साँप का उदाहरण –

जैसे गरुड़ (जो सर्पों के शत्रु हैं) के सामने छोटा साँप कुछ नहीं कर सकता, वैसे ही राम जी के सामने मेघनाद की माया तुच्छ है।

🌼 आध्यात्मिक संदेश

अधर्म और अहंकार अंत में नष्ट होते हैं।

ईश्वर के सामने मायावी शक्ति टिक नहीं सकती।

सच्चा बल धर्म और भक्ति में है।

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