लंकाकांड दोहा (47)
लंकाकांड दोहा (47) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
भावार्थ
जब चारों दिशाओं में घना अंधकार छा गया, तब वानर-सेना अत्यन्त घबरा गई। अंधेरे के कारण वे एक-दूसरे को देख भी नहीं पा रहे थे, इसलिए जहाँ-तहाँ एक-दूसरे को पुकारने लगे।
विस्तृत विवेचन
इस दोहे में तुलसीदास जी युद्ध के पहले उत्पन्न भय और भ्रम का सजीव चित्रण करते हैं। रात्रि के समय राक्षसों की मायावी शक्ति से चारों ओर घोर अंधकार फैल जाता है। यह अंधकार केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है—जिसमें साहसी वानर भी क्षणभर के लिए विचलित हो जाते हैं।
वानर-दल का एक-दूसरे को न देख पाना यह दर्शाता है कि माया और अज्ञान में पड़कर जीव अपनी शक्ति और साथ को भूल जाता है। पुकारना इस बात का संकेत है कि संकट में पड़ते ही सभी आश्रय और सहारे की खोज करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से, यह दोहा बताता है कि जब जीवन में अज्ञान का अंधकार छा जाता है, तब मनुष्य भी मार्ग भूलकर व्याकुल हो उठता है। आगे चलकर यही परिस्थिति प्रभु-कृपा की आवश्यकता को उजागर करती है—क्योंकि राम-स्मरण से ही यह अंधकार नष्ट होता है और भय का अंत होता है।
इस प्रकार, यह दोहा युद्ध-प्रसंग के साथ-साथ जीवन का गूढ़ संदेश देता है कि माया के अंधकार में भी प्रभु-स्मरण ही प्रकाश है।
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