लंकाकांड चौपाई (487-494)

 लंकाकांड चौपाई (487-494) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन :

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे।।

लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा।।

एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती।।

क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता।।

नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा।।

रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना।।

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी।।

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें।।

प्रसंग

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है। इसमें लक्ष्मण और मेघनाद (इंद्रजीत) के भयंकर युद्ध का वर्णन है।

✍️ भावार्थ :

1️⃣ घायल बीर बिराजहिं कैसे...

युद्ध में घायल वीर ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे लाल फूलों से खिला हुआ किंसुक (पलाश) का वृक्ष।

2️⃣ लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा...

लक्ष्मण और मेघनाद दोनों महान योद्धा क्रोधपूर्वक युद्ध कर रहे थे।

3️⃣ एकहि एक सकइ नहिं जीती...

दोनों में से कोई भी किसी को हरा नहीं पा रहा था। तब मेघनाद ने छल-बल (अनीति) का सहारा लिया।

4️⃣ क्रोधवंत तब भयउ अनंता...

क्रोधित होकर लक्ष्मण (जो शेषनाग के अवतार हैं) ने मेघनाद का रथ और सारथी तोड़ दिया।

5️⃣ रावन सुत निज मन अनुमाना...

मेघनाद ने समझ लिया कि अब उसका जीवन संकट में है।

6️⃣ बीरघातिनी छाड़िसि साँगी...

उसने ‘बीरघातिनी’ नामक घातक अस्त्र छोड़ा, जो लक्ष्मण के वक्षस्थल में लगा और वे मूर्छित हो गए।

🔎 विस्तृत विवेचन

तुलसीदास जी ने उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है — घायल वीरों की तुलना किंसुक वृक्ष से।

लक्ष्मण और मेघनाद दोनों की वीरता समान दिखाई गई है।

मेघनाद का छल दिखाता है कि अधर्म अंत में कपट का सहारा लेता है।

लक्ष्मण का मूर्छित होना कथा में करुण रस उत्पन्न करता है और आगे हनुमान जी द्वारा संजीवनी लाने का प्रसंग तैयार करता है।

✨ निष्कर्ष

इन चौपाइयों में वीर रस और करुण रस दोनों का सुंदर संगम है। यह प्रसंग धर्म-अधर्म के संघर्ष और लक्ष्मण जी की अद्भुत वीरता को दर्शाता है।

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