लंकाकांड दोहा (50)

लंकाकांड दोहा 50 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ।

उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ।।49।।

भावार्थ :

जब मेघनाद ने यह समाचार अपने कानों से सुना, तो वह तुरंत फिर से किले (गढ़) के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। वह वीर दुर्ग से उतरकर युद्ध के लिए सामने आया और अपने युद्ध के बाजे बजवाते हुए रणभूमि की ओर बढ़ चला।

🔹 विस्तृत विवेचन

यह दोहा लंका कांड के युद्ध प्रसंग का है। इसमें रावणपुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) के साहस और युद्ध-उत्साह का वर्णन है।

“मेघनाद सुनि श्रवन अस” –

जब मेघनाद ने वानर सेना की प्रगति या अपने सैनिकों की पराजय का समाचार सुना, तो वह क्रोधित और उत्साहित हो उठा।

“गढ़ु पुनि छेंका आइ” –

वह तुरंत किले के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। यह उसकी तत्परता और वीरता को दर्शाता है।

“उतर्यो बीर दुर्ग तें” –

वह दुर्ग से नीचे उतरा, अर्थात युद्धभूमि में प्रवेश किया। यह बताता है कि वह स्वयं युद्ध करने को तैयार था, केवल आदेश देने वाला नहीं।

“सन्मुख चल्यो बजाइ” –

वह बाजे-गाजे के साथ, पूरे आत्मविश्वास और शौर्य के साथ शत्रु के सामने बढ़ा। यहाँ ‘बजाइ’ से आशय रणभेरी बजवाने से है, जो युद्ध की घोषणा का प्रतीक है।

🔹 सार

इस दोहे में मेघनाद की वीरता, उत्साह और युद्ध के प्रति उसकी तत्परता का चित्रण किया गया है। वह अपने सैनिकों की रक्षा और लंका की मर्यादा के लिए स्वयं रणभूमि में उतरता है।


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