लंकाकांड चौपाई (503-510)
लंकाकांड चौपाई (503-510) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी।।
उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा।।
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना।।
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।।
भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना।।
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा।।
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।।
काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।।
भावार्थ :
1️⃣
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी।।
👉 भावार्थ:
हनुमान जी (पवनपुत्र) ने श्रीराम के कमल समान चरणों को हृदय में धारण किया और बलपूर्वक संजीवनी लाने के लिए चल पड़े।
👉 विवेचन:
यहाँ “राम चरण सरसिज” भक्ति और शक्ति का प्रतीक है। तुलसीदास जी दिखाते हैं कि सच्चा बल भगवान को हृदय में रखने से मिलता है।
2️⃣
उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा।।
👉 भावार्थ:
उधर एक दूत ने रावण को सूचना दी कि हनुमान संजीवनी लेने जा रहे हैं। तब रावण कालनेमि के घर पहुँचा।
👉 विवेचन:
रावण छल से कार्य सिद्ध करना चाहता है। वह कालनेमि को हनुमान का मार्ग रोकने को कहता है।
3️⃣
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना।।
👉 भावार्थ:
रावण ने अपना रहस्य बताया, जिसे सुनकर कालनेमि बार-बार सिर हिलाने लगा।
👉 विवेचन:
कालनेमि समझ गया कि रामदूत को रोकना असंभव है, फिर भी रावण के भय से तैयार हो गया।
4️⃣
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।।
👉 भावार्थ:
कालनेमि कहता है—जिसने आपकी लंका जला दी, उसका मार्ग कौन रोक सकता है?
👉 विवेचन:
यह हनुमान जी की महाशक्ति का स्वीकार है।
5️⃣
भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना।।
👉 भावार्थ:
हे रावण! अपने हित के लिए श्रीराम का भजन करो और व्यर्थ बातें छोड़ दो।
👉 विवेचन:
यहाँ शत्रु भी रामभक्ति का उपदेश दे रहा है—राम की शरण ही कल्याणकारी है।
6️⃣
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा।।
👉 भावार्थ:
नील कमल के समान सुंदर श्याम श्रीराम को हृदय में बसाओ।
👉 विवेचन:
भगवान का ध्यान मन को पवित्र करता है।
7️⃣
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।।
👉 भावार्थ:
‘मैं’ और ‘मेरा’ की मूर्खता छोड़ दो और मोह की रात से जागो।
👉 विवेचन:
अहंकार ही पतन का कारण है। तुलसीदास जी यहाँ वैराग्य का संदेश देते हैं।
8️⃣
काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।।
👉 भावार्थ:
जो कालरूपी सर्प सबको निगल जाता है, उसे युद्ध में कोई जीत नहीं सकता।
👉 विवेचन:
राम स्वयं काल के भी काल हैं। रावण का विनाश निश्चित है।
✨ समग्र संदेश (2 मुख्य बिंदु)
रामभक्ति ही वास्तविक शक्ति है।
अहंकार और मोह विनाश का कारण हैं।
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