लंकाकांड दोहा (52)
लंकाकांड दोहा (52) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट।
ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट।।51।।
🔹 शब्दार्थ
जासु – जिसकी (भगवान राम की)
प्रबल माया – अत्यंत शक्तिशाली माया
सिव – भगवान शिव
बिरंचि – ब्रह्मा जी
निसिचर – राक्षस (मेघनाद)
मति खोट – दूषित बुद्धि
🔹 भावार्थ :
जिस भगवान की माया इतनी प्रबल है कि शिव और ब्रह्मा जैसे देवता भी उसके आगे छोटे हैं,
उसी भगवान को एक राक्षस(मेघनाद )अपनी झूठी माया दिखाने की कोशिश कर रहा है — यह उसकी मूर्खता और दूषित बुद्धि है।
🔹 विस्तृत विवेचन
यहाँ तुलसीदास जी बता रहे हैं कि:
भगवान राम की माया इतनी महान है कि शिव और ब्रह्मा भी उसके अधीन हैं।
लेकिन मेघनाद (राक्षस) अपनी माया से भगवान को भ्रमित करना चाहता है।
👉 यह अहंकार (ego) का प्रतीक है।
जब मनुष्य अपनी छोटी शक्ति पर घमंड करता है, तो वह भगवान की महानता को नहीं समझ पाता।
🔹 संदेश
भगवान की शक्ति के आगे सब छोटी है।
अहंकार व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है।
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