लंकाकांड दोहा (55)
लंकाकांड दोहा (55) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।
जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ।।54।।
भावार्थ:
मेघनाद जैसे करोड़ों वीर योद्धा मिलकर भी जगदाधार शेषनाग (अर्थात् लक्ष्मणजी) को उठा नहीं सके। वे उन्हें हिला भी न पाए और अंत में लज्जित होकर लौट गए।
विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग उस समय का है जब युद्ध में लक्ष्मणजी मूर्छित हो जाते हैं। राक्षस उन्हें बंदी बनाने या उठाकर ले जाने का प्रयास करते हैं।
“मेघनाद सम कोटि सत जोधा” – तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघनाद जैसे असंख्य बलवान योद्धा भी मिल जाएँ तो भी…
“जगदाधार सेष” – यहाँ लक्ष्मणजी को शेषनाग का अवतार बताया गया है। शेषनाग ही पृथ्वी का भार धारण करते हैं, इसलिए उन्हें “जगदाधार” कहा गया है।
ऐसे दिव्य स्वरूप को सामान्य राक्षस कैसे उठा सकते थे?
इस प्रकार राक्षसों का अहंकार टूट जाता है और वे खिसियाकर (लज्जित होकर) वापस चले जाते हैं।
मुख्य संदेश
लक्ष्मणजी साधारण मानव नहीं, दिव्य शक्ति (शेषनाग) के अवतार हैं।
अधर्म की शक्ति चाहे कितनी भी बड़ी हो, वह धर्म के आधार को हिला नहीं सकती।
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