लंकाकांड दोहा (56)
लंकाकांड दोहा (56) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा:
राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन।।55।।
🌿 भावार्थ (Simple Meaning)
वैद्य सुषेण ने भगवान श्रीराम के चरणों में सिर नवाया और कहा –
हे प्रभु! एक विशेष पर्वत पर एक दिव्य औषधि है।
उसे लेने के लिए पवनपुत्र हनुमान को भेजिए।
📝 विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड का है।
जब लक्ष्मण जी मेघनाद के शक्तिबाण से मूर्छित हो जाते हैं, तब पूरी वानर सेना चिंतित हो जाती है। उस समय वैद्य सुषेण को बुलाया जाता है। वे भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके बताते हैं कि लक्ष्मण जी को बचाने के लिए हिमालय के एक पर्वत से संजीवनी बूटी लानी होगी।
यह कार्य केवल हनुमान ही कर सकते हैं, क्योंकि वे बल, बुद्धि और गति में अद्वितीय हैं।
🌟 आध्यात्मिक संदेश
संकट में सच्चे सेवक ही काम आते हैं।
हनुमान जी की भक्ति और सेवा-भाव आदर्श है।
भगवान के कार्य में समर्पण ही सबसे बड़ा बल है।
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