लंकाकांड दोहा (57)

 लंकाकांड दोहा (57) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहे का भावार्थ (सही संदर्भ में)

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।

राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार।।56।।

जब रावण ने  कालनेमी को मारने की बात कही तो कालनेमी मन में विचार किया कि –

“मैं इस रामदूत (हनुमान) के हाथ मरूं क्योंकि यह दुष्ट पाप का भार है।”

यह सोचकर उसने कालनेमि ने आदेश का पालन किया कि वह किसी छल से हनुमान जी को रोक देगा।

🔹 विशेष बात

यहाँ रावण सीधे युद्ध नहीं करता, बल्कि छल का सहारा लेता है।

कालनेमि मुनि का रूप धारण कर हनुमान जी को रोकने का प्रयास करता है।

यही रावण की कुटिल नीति और अधर्म को दर्शाता है।

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