लंकाकांड दोहा (58)
लंकाकांड दोहा (58) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।
मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान।।57।।
भावार्थ :
जब हनुमान जी सरोवर में प्रवेश करते हैं, तो एक मगरी (मगरमच्छ) उनका पैर पकड़ लेती है।
हनुमान जी उसे मार देते हैं। तब वह मगरी अपना दिव्य रूप धारण करके आकाश में चली जाती है।
🔎 विस्तृत विवेचन
प्रसंग
जब रावण ने कालनेमी को भेजा ताकि वह हनुमान जी को रोक सके, तब कालनेमी ने माया से एक आश्रम और सरोवर बनाया।
हनुमान जी जल पीने के लिए सरोवर में गए।
मकरी का रहस्य
वह मगरी वास्तव में एक अप्सरा थी, जिसे शाप मिला था।
जैसे ही हनुमान जी ने उसे मारा, शाप समाप्त हो गया और वह दिव्य रूप में आकाश को चली गई।
आध्यात्मिक अर्थ
मगरी = माया और बाधा
हनुमान = भक्ति और शक्ति
संदेश: सच्ची भक्ति से माया और बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
🌺 सीख
✔️ भगवान के कार्य में बाधाएँ आती हैं।
✔️ परंतु सच्चे भक्त (हनुमान जी) उन्हें तुरंत दूर कर देते हैं।
✔️ ईश्वर कार्य में कोई माया टिक नहीं सकती।
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