लंकाकांड चौपाई (682-691)
लंकाकांड चौपाई (682-691) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे:
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।।
अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी।।
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा।।
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा।।
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही।।
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो।।
मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती।।
पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ। महि पछारि निज बल देखरायो।।
बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा।।
इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो।।
यह चौपाई रामचरितमानस के लंका कांड से ली गई है। इसमें मेघनाद और जामवंत के युद्ध का अत्यंत रोचक वर्णन है।
🔹 भावार्थ :
“चरित राम के सगुन भवानी…”
भगवान राम के गुण और लीलाएं तर्क, बुद्धि या वाणी से पूरी तरह समझी नहीं जा सकतीं।
इसलिए ज्ञानी और विरक्त लोग तर्क छोड़कर केवल राम का भजन करते हैं।
“ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा…”
मेघनाद ने जोरदार गर्जना करके वानर सेना को व्याकुल कर दिया और घमंड से भरे शब्द बोले।
“जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा…”
जामवंत ने उसे ललकारा—“अरे दुष्ट! रुक जा।”
यह सुनकर मेघनाद को बहुत क्रोध आया।
“बूढ़ जानि सठ…”
मेघनाद जामवंत को बूढ़ा समझकर अपमान करता है और कहता है कि मैं तुझे छोड़ रहा हूँ, फिर भी तू मुझे ललकार रहा है।
“अस कहि तरल त्रिसूल…”
वह त्रिशूल चलाता है, लेकिन जामवंत उसे पकड़कर उसी पर प्रहार कर देते हैं।
“मारिसि मेघनाद कै छाती…”
जामवंत ने मेघनाद की छाती पर प्रहार किया, जिससे वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।
“पुनि रिसान…”
होश आने पर मेघनाद क्रोधित होकर जामवंत को उठाकर पटक देता है, अपनी शक्ति दिखाता है।
“बर प्रसाद सो मरइ न मारा…”
मेघनाद को वरदान प्राप्त था, इसलिए वह मारा नहीं जा सकता था।
फिर उसने जामवंत को पकड़कर लंका में फेंक दिया।
“इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो…”
इसी समय देवताओं ने गरुड़ को भेजा, जो तुरंत रामजी के पास पहुँच गए।
🔹 विस्तृत विवेचन:
यह प्रसंग बताता है कि राम की महिमा तर्क से परे है—उन्हें केवल भक्ति से ही पाया जा सकता है।
मेघनाद (अहंकार) और जामवंत (ज्ञान/अनुभव) का युद्ध दर्शाता है कि अहंकार कभी-कभी ज्ञान को भी चुनौती देता है।
जामवंत का पराक्रम दिखाता है कि वृद्ध या अनुभवी व्यक्ति को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए।
मेघनाद का वरदान यह संकेत देता है कि अधर्म कभी-कभी तुरंत नष्ट नहीं होता, पर अंत निश्चित होता है।
गरुड़ का आगमन यह दर्शाता है कि जब संकट चरम पर होता है, तब ईश्वर सहायता अवश्य भेजते हैं।
🔹 निष्कर्ष:
राम की लीला तर्क से नहीं, भक्ति से समझ आती है।
अहंकार अंत में हारता है, चाहे कुछ समय तक शक्तिशाली क्यों न लगे।
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