लंकाकांड चौपाई (692-705)

 लंकाकांड चौपाई (692-705) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन 

मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी।।

तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा।।

इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा।।

मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन।।

जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि।।

सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना।।

लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई।।

तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही।।

मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई।।

जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन।।

जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन।।

प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा।।

जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं।।

जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई।।

यह रामचरितमानस के लंकाकांड का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है।

🔹 भावार्थ (सरल)

मेघनाद (इंद्रजीत) मूर्छा से जागकर पिता रावण को देखकर लज्जित हुआ।

वह तुरंत गुफा में जाकर “अजय यज्ञ” करने का निश्चय करता है।

विभीषण राम से कहते हैं—यह मायावी मेघनाद यज्ञ करके अजेय बन जाएगा, इसे रोकना जरूरी है।

राम आदेश देते हैं कि लक्ष्मण वानरों के साथ जाकर यज्ञ नष्ट करें और मेघनाद का वध करें।

लक्ष्मण प्रण लेते हैं कि आज मेघनाद को मारे बिना वापस नहीं आएंगे।

🔹 विस्तृत विवेचन (Deep Meaning)

1. मेघनाद का अहंकार और रणनीति

मेघनाद लज्जित होकर “अजय मख (यज्ञ)” करता है → यह उसकी माया + शक्ति का प्रतीक है।

👉 संदेश: अधर्मी लोग सीधे नहीं, चालाकी से जीतना चाहते हैं।

2. विभीषण की बुद्धि (धर्म की आवाज)

विभीषण ने सही समय पर चेतावनी दी।

👉 धर्म + ज्ञान = सही निर्णय

3. राम की नीति

राम स्वयं नहीं जाते, बल्कि लक्ष्मण को भेजते हैं।

👉 नेतृत्व का गुण: सही व्यक्ति को सही काम देना।

4. लक्ष्मण का वीर संकल्प

“आज बिना मारे लौटूं तो सेवक नहीं”

👉 यह कर्तव्य, निष्ठा और वीरता का सर्वोच्च उदाहरण है।

5. धर्म vs अधर्म का सिद्धांत

मेघनाद → माया, छल, अधर्म

लक्ष्मण → सत्य, साहस, धर्म

👉 अंत में जीत हमेशा धर्म की होती है।

🔹 निष्कर्ष :

अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, उसका अंत निश्चित है।

सच्ची जीत बुद्धि + साहस + धर्म से मिलती है।

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