लंकाकांड चौपाई (706-721)

 लंकाकांड चौपाई (706-721) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा।।

कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा।।

तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई।।

लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे।।

आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा।।

कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए।।

प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा।।

उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा।।

फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा।।

आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला।।

देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना।।

बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई।।

देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।।

लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा।।

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा।।

छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड का है, जहाँ मेघनाद (इंद्रजीत) के यज्ञ-विघ्न और युद्ध का वर्णन है।

🔹 भावार्थ :

वानर सेना ने जाकर देखा कि मेघनाद यज्ञ कर रहा है और उसमें रक्त व भैंसे की आहुति दे रहा है।

वानरों ने तुरंत उस यज्ञ को नष्ट कर दिया, लेकिन मेघनाद नहीं उठा।

तब वानरों ने उसके बाल पकड़कर और लात मारकर उसे परेशान किया, तब वह उठा और त्रिशूल लेकर वानरों पर टूट पड़ा।

हनुमानजी और अंगद ने उससे युद्ध किया। अंगद ने त्रिशूल तोड़ दिया और उसे गिरा दिया।

हनुमानजी ने भी उसे बहुत मारा, पर वह मरता नहीं था।

फिर वह मायावी बनकर कभी दिखता, कभी गायब हो जाता था। इससे वानर डर गए।

तब लक्ष्मणजी ने निश्चय किया कि अब इसे समाप्त करना ही होगा।

उन्होंने श्रीराम का स्मरण करके शक्तिशाली बाण चलाया, जो उसके हृदय में लगा।

मरते समय मेघनाद ने अपना सारा छल छोड़ दिया।

🔹 विस्तृत विवेचन

1. मेघनाद का यज्ञ और अधर्म

मेघनाद यज्ञ में रक्त और पशु बलि दे रहा था

यह “तामसिक यज्ञ” है → अधर्म और राक्षसी प्रवृत्ति का प्रतीक

👉 संदेश:

धर्म के विरुद्ध किया गया तप या यज्ञ भी विनाश का कारण बनता है।

2. वानरों द्वारा यज्ञ-विध्वंस

वानरों ने यज्ञ तोड़ दिया → धर्म की रक्षा

पहले समझाया नहीं, सीधे कार्य किया

👉 संदेश:

जब अधर्म चरम पर हो, तब उसे तुरंत रोकना चाहिए।

3. मेघनाद की माया और अहंकार

वह बार-बार रूप बदलकर लड़ता है

सीधा युद्ध नहीं करता

👉 संदेश:

अहंकारी व्यक्ति छल-कपट का सहारा लेता है, पर अंत में हारता है।

4. हनुमान और अंगद का पराक्रम

त्रिशूल तोड़ना → शक्ति और साहस का प्रतीक

फिर भी मेघनाद नहीं मरता → उसकी माया प्रबल है

👉 संदेश:

केवल बल नहीं, सही समय और रणनीति भी जरूरी है।

5. लक्ष्मणजी का निर्णय और विजय

लक्ष्मण ने श्रीराम का स्मरण किया

दिव्य बाण से मेघनाद का अंत किया

👉 संदेश:

ईश्वर स्मरण + दृढ़ निश्चय = सफलता

6. अंत समय में कपट त्याग

मरते समय मेघनाद ने छल छोड़ दिया

👉 संदेश:

सत्य अंत में प्रकट होता ही है, चाहे व्यक्ति कितना भी मायावी क्यों न हो।

🔹 निष्कर्ष (2 मुख्य बिंदु)

अधर्म और छल से प्राप्त शक्ति स्थायी नहीं होती।

ईश्वर स्मरण और धर्म का साथ अंततः विजय दिलाता है।

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