लंकाकांड चौपाई (731-739) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (731-739) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन।।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।।
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा।।
सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला।।
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई।।
निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा।।
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा।।
चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली।।
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला।।
छं0-अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते।
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते।।
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने।।
यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है, जहाँ मेघनाद (इंद्रजीत) के मारे जाने के बाद रावण की स्थिति, उसके अहंकार और युद्ध की तैयारी का चित्रण है।
🔹 भावार्थ (सरल भाषा में)
“तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन…” से “ते नर न घनेरे” तक
रावण अपनी रानियों को ज्ञान और वैराग्य का उपदेश देता है—कि यह संसार नश्वर है।
👉 लेकिन स्वयं वह इस ज्ञान को नहीं अपनाता।
👉 तुलसीदास जी कहते हैं—दूसरों को उपदेश देने वाले बहुत होते हैं, पर उसे आचरण में लाने वाले बहुत कम।
“निसा सिरानि…” से “देहउँ उतरु…” तक
रात बीत गई, सुबह हो गई।
वानर-भालू सेना ने लंका के चारों द्वार घेर लिए।
रावण ने अपने वीरों को बुलाकर कहा—
👉 जो युद्ध से डरता हो, वह अभी लौट जाए।
👉 जो सामने आएगा, मैं अपनी भुजाओं के बल से उसे जवाब दूँगा।
“अस कहि…” से “आँधी चली” तक
रावण ने तेज गति से रथ सजाया, युद्ध के बाजे बजने लगे।
उसकी विशाल सेना ऐसे चली जैसे काले बादलों की आँधी आ रही हो।
🔹 छंद का भावार्थ (अशुभ संकेत)
युद्ध के समय बहुत सारे अशुभ संकेत (अपशकुन) दिखने लगे—
योद्धाओं के हाथ से हथियार गिरने लगे
घोड़े, हाथी डरकर भागने लगे
सियार, गिद्ध, गधे, कुत्ते डरावनी आवाजें करने लगे
उल्लू (कालदूत जैसे) भयानक संकेत दे रहे थे
👉 ये सब संकेत बता रहे थे कि रावण का विनाश निश्चित है।
🔹 विस्तृत विवेचन (Deep Meaning)
1. ज्ञान और आचरण का अंतर
रावण बहुत बड़ा ज्ञानी था, लेकिन उसका अहंकार उसे सही रास्ते पर चलने नहीं देता।
संदेश: केवल ज्ञान होना पर्याप्त नहीं, उसे जीवन में उतारना जरूरी है।
2. अहंकार (Ego) का विनाश
रावण को बार-बार अपशकुन दिखते हैं, फिर भी वह उन्हें नजरअंदाज करता है।
उसका घमंड (भुजबल गर्व) उसे सच्चाई देखने नहीं देता।
👉 यही उसका पतन (destruction) का कारण बनता है।
3. प्रकृति के संकेत
युद्ध से पहले प्रकृति खुद संकेत देती है (जैसे पशुओं की आवाजें, हथियार गिरना)।
यह दर्शाता है कि अधर्म का अंत निश्चित है।
4. धर्म vs अधर्म
वानर-सेना धर्म (राम पक्ष) का प्रतीक है
रावण की सेना अधर्म का
👉 अंत में हमेशा धर्म की विजय होती है।
🔹 निष्कर्ष (Short)
👉 रावण का ज्ञान बेकार हो गया क्योंकि उसने उसे अपनाया नहीं।
👉 अहंकार और गलत निर्णय ही उसके विनाश का कारण बने।
👉 यह प्रसंग सिखाता है—ज्ञान + विनम्रता = सफलता, अहंकार = विनाश।
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