लंकाकांड दोहा (75)

 लंकाकांड दोहा (75) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत।

अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत।।75।।

 भावार्थ :

अनंत (लक्ष्मण जी) ने श्रीराम जी के चरणों में सिर झुकाकर तुरंत युद्ध के लिए प्रस्थान किया। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और वीर हनुमान जैसे शक्तिशाली योद्धा भी थे।

🔹 विस्तृत विवेचन

आज्ञा और समर्पण

लक्ष्मण जी (अनंत) पहले श्रीराम के चरणों में सिर नवाते हैं—यह उनके पूर्ण समर्पण और आज्ञापालन को दर्शाता है।

👉 मतलब: बिना अहंकार के, केवल प्रभु की आज्ञा से कार्य करना।

वीरों का समूह

अंगद, नील, नल, मयंद और हनुमान—all are सुभट (महान योद्धा)।

👉 यह दिखाता है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति + एकता दोनों जरूरी हैं।

युद्ध के लिए तत्परता

“तुरंत चलेउ” शब्द बताता है कि विलंब नहीं किया—

👉 सही कार्य में delay नहीं होना चाहिए।

🔹 मुख्य संदेश (2 points only)

गुरु/ईश्वर की आज्ञा मानकर कार्य करना ही सफलता का मार्ग है।

एकता और साहस से ही बड़ी विजय मिलती है।

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