लंकाकांड दोहा (77)

 लंकाकांड दोहा (77) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि।

नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि।।77।।

भावार्थ :

रावण (दसकंठ) अपनी स्त्रियों को अलग-अलग प्रकार से समझाता है कि यह संसार और शरीर नश्वर (नाशवान) है, इसलिए अधिक शोक मत करो।

🧠 विस्तृत विवेचन:

इस दोहे में रावण का एक अलग ही रूप दिखता है।

जब युद्ध में बुरे संकेत मिलते हैं (जैसे मेघनाद की मृत्यु), तब रावण अपनी रानियों को समझाता है।

वह कहता है कि यह संसार और शरीर दोनों नाशवान हैं, इसलिए किसी के मरने पर अत्यधिक शोक करना उचित नहीं।

👉 यहाँ एक गहरी बात है:

रावण खुद अधर्म के रास्ते पर है, लेकिन ज्ञान की बातें सही कर रहा है

यह दिखाता है कि ज्ञान होना अलग है, और उस पर चलना अलग

🔍 मुख्य संदेश:

संसार नश्वर है – हर चीज एक दिन खत्म होती है, इसलिए मोह कम रखना चाहिए।

रावण का विरोधाभास – खुद गलत रास्ते पर होते हुए भी दूसरों को सही ज्ञान देना।

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