लंकाकांड दोहा (78)
लंकाकांड दोहा (78) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम।।78।।
यह दोहा रामचरितमानस के लंका कांड में उस समय आता है जब रावण युद्ध के लिए निकल रहा होता है—और उसी प्रसंग में यह गहरी नीति कही गई है।
🔹 प्रसंग (Context – रावण का युद्ध प्रस्थान)
मेघनाद आदि वीरों के मारे जाने के बाद रावण क्रोध और अहंकार में भरकर युद्ध के लिए तैयार होता है।
उसे कई बार समझाया गया (मंदोदरी, विभीषण आदि द्वारा), लेकिन वह मोह और अभिमान में अंधा होकर नहीं मानता।
👉 ऐसे समय में यह दोहा बताया गया है, जो रावण की मानसिक स्थिति पर सीधा प्रहार करता है।
🔸 दोहा
“ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम।। ”
🔸 गहराई से विवेचन (Ravana Context में)
1. ❌ “राम बिमुख” = रावण की सबसे बड़ी गलती
रावण भगवान राम का विरोध करता है
उसने सीता हरण किया → धर्म के खिलाफ गया
👉 इसलिए वह “राम बिमुख” है (धर्म से दूर)
2. ❌ “मोहबस” = अहंकार और अज्ञान
रावण बहुत ज्ञानी था, पर अहंकार (अहं) ने उसे अंधा कर दिया
उसे लगता है कि वह अजेय है
👉 यही मोह उसे विनाश की ओर ले जा रहा है
3. ❌ “भूत द्रोह रत” = सबका शत्रु
रावण देवताओं, ऋषियों, यहाँ तक कि साधारण जीवों को भी सताता है
वह दूसरों के कष्ट में ही आनंद लेता है
👉 ऐसे व्यक्ति के भीतर कभी शांति नहीं हो सकती
4. ❌ “संपत्ति” होने पर भी अशांति
रावण के पास सोने की लंका, शक्ति, विद्या सब कुछ था
फिर भी उसका मन अशांत था
👉 इसलिए कहा: उसे सपने में भी विश्राम नहीं मिलता
🔸 असली संदेश (Deep Moral)
यह दोहा सीधे रावण को लक्ष्य करके कहता है:
👉 धन, बल, बुद्धि सब व्यर्थ है अगर:
तुम धर्म (राम) के विरोध में हो
तुम दूसरों से द्वेष रखते हो
तुम अहंकार में डूबे हो
🔸 निष्कर्ष (Short)
रावण का पतन उसकी राम-विमुखता + अहंकार + द्वेष के कारण हुआ
यह दोहा बताता है:
👉 “ऐसे व्यक्ति को कभी सच्चा सुख नहीं मिल सकता, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो”
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